राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने बृहस्पतिवार को महाराष्ट्र सरकार पर 12 हजार करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया है। यह जुर्माना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाने के लिए किया है। हरित खंडपीठ के अनुसार, महाराष्ट्र सरकार ठोस और तरल कचरे का प्रबंध करने में नाकाम रही है।
इस कुप्रबंधन के कारण पर्यावरण को क्षति हुई, जिसके आधार पर जुर्माना की प्रक्रिया लगाई जाती है। जस्टिस आदर्श कुमार गोयल की खंडपीठ ने निर्देश पारित करते हुए कहा कि पर्यावरण को लगातार हो रहे नुकसान को दूर करने और सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों का पालन करने के लिए एनजीटी अधिनियम की धारा 15 के तहत जुर्माना लगाया गया।
दो माह में जमा कराएं राशि
खंडपीठ ने कहा कि आवश्यक दायित्व तय किए बिना ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के लिए पिछले आठ वर्षों में और तरल अपशिष्ट प्रबंधन के लिए पिछले पांच वर्षों की समयसीमा समाप्त होने के बाद भी कोई व्यापक कदम नहीं उठाए गए। ऐसे में भविष्य में नुकसान को रोकने की आवश्यकता है। लिहाजा, महाराष्ट्र सरकार पर 12 हजार करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया जाता है। यह राशि राज्य को दो महीने के भीतर जमा करानी होगी। इस राशि को मुख्य सचिव के निर्देशों के अनुसार संचालित किया जाएगा।
पिछले हफ्ते पश्चिम बंगाल पर लगा था जुर्माना
बता दें कि पांच दिन पहले एनजीटी ने पश्चिम बंगाल सरकार के खिलाफ 3,500 करोड़ रुपये का पर्यावरणीय मुआवजा लगाया था। बंगाल सरकार ने भी ठोस व तरल कचरे के प्रबंधन में लापरवाही बरती थी। खंडपीठ के अनुसार राज्य सरकार ने शहरी क्षेत्रों में ठोस और सीवेज उपचार संयंत्रों को ज्यादा प्राथमिकता नहीं दी, जिससे पर्यावरण को काफी नुकसान हुआ।
एनजीटी ने की थी अहम टिप्पणी
एनजीटी अध्यक्ष जस्टिस एके गोयल की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा था कि स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों से लापरवाही नहीं कर सकते। इसे लंबे समय के लिए टाला नहीं जा सकता। प्रदूषण मुक्त वातावरण प्रदान करना राज्य और स्थानीय निकायों की संवैधानिक जिम्मेदारी है। पैनल ने कहा था कि जीवन के अधिकार का हिस्सा होने के नाते धन की कमी के हवाले से इस तरह के अधिकार से इनकार नहीं किया जा सकता है। पर्यावरण को नुकसान को ध्यान में रखते हुए हम मानते हैं कि पिछले उल्लंघनों के लिए मुआवजे का भुगतान जल्द से जल्द किया जाना चाहिए और आगे से इस बात का विशेष ध्यान रखा जाए और पर्यावरण संरक्षण के लिए काम किया जाए।