देश में औद्योगिक कचरा और उसका प्रबंधन चिंता का विषय बना हुआ है। वहीं नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) को औद्योगिक प्रक्रियाओं और उत्पादन से अवशेषों से उत्पन्न सामग्री को अपशिष्ट या उप-उत्पाद के रूप में पहचानने के लिए तत्काल उपाय करने का निर्देश दिया है।
ट्रिब्यूनल केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा जारी औद्योगिक प्रक्रियाओं से उत्पन्न सामग्रियों की अपशिष्ट के रूप में पहचान पर रूपरेखा के कार्यान्वयन न होने के संबंध में एक मामले की सुनवाई कर रहा था। एनजीटी के आदेश के बाद सितंबर 2019 में रूपरेखा जारी की गई थी। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना था कि किसी भी खतरनाक कचरे को उत्पादन के उप-उत्पाद के रूप में वर्गीकृत नहीं किया जाए।
याचिका के अनुसार, किसी भी उत्पादन प्रक्रिया से उत्पन्न सामग्री को कब "उप-उत्पाद" माना जाना चाहिए और कब इसे "अपशिष्ट" माना जाना चाहिए, इसकी रूपरेखा स्थापित नहीं की गई है। शुक्रवार को पारित एक आदेश में, कार्यवाहक अध्यक्ष न्यायमूर्ति एसके सिंह की पीठ ने मामले को वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (एमओईएफसीसी) को भेज दिया क्योंकि उठाए गए मुद्दों पर आगे विचार की आवश्यकता थी।
न्यायमूर्ति अरुण कुमार त्यागी और विशेषज्ञ सदस्य ए सेंथिल वेल की पीठ ने यह निर्देश दिया कि मंत्रालय को सीपीसीबी, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (पीसीबी) और प्रदूषण नियंत्रण समितियों (पीसीसी) के परामर्श से औद्योगिक प्रक्रिया से उत्पन्न सामग्री की अपशिष्ट या अपशिष्ट उत्पाद के रूप में पहचान पर ढांचे के उचित कार्यान्वयन के लिए तत्काल उपाय करना होगा। एनजीटी ने मंत्रालय को तीन महीने के भीतर की गई कार्रवाई रिपोर्ट सौंपने को भी कहा।