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Khabaron Ke Khiladi: एमपी-राजस्थान में कफ सिरप ले रहा जान; विश्लेषकों ने बताया किसकी चूक, कौन जिम्मेदार?

Sat, 11 Oct 2025 05:18 PM IST
संध्या न्यूज डेस्क, अमर उजाला

सार

बीते दिनों छिंदवाड़ा और राजस्थान के कई स्थानों से कफ सिरप पीने से बच्चों की मौत की खबरें सामने आई। जांच में पाया गया कि  दूषित कफ सिरप से बच्चों की किडनियां फेल होने से मौतें हुई हैं। आज इसी विषय पर चर्चा कि आखिर मासूमों की मौत का जिम्मेदार कौन? 

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खबरों के खिलाड़ी में जहरीले कफ सिरप कांड पर चर्चा - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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बीता हफ्ता एक दुखद खबर की वजह से चर्चा में रहा। खबर कफ सिरप की थी। वो सिरप जो मध्य प्रदेश और राजस्थान में कई बच्चों की मौत की वजह बन गया। ये आंकड़ा बढ़ भी सकता है। कहां चूक हो रही है? कौन जिम्मेदार है? सिस्टम जिम्मेदार है या व्यवस्था जिम्मेदार है? ऐसे ही सवालों पर इस हफ्ते खबरों के खिलाड़ी में चर्चा हुई। चर्चा लिए वरिष्ठ पत्रकार विनोद अग्निहोत्री, पूर्णिमा त्रिपाठी, अवधेश कुमार और राकेश शुक्ल मौजूद रहे। 
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विनोद अग्निहोत्री:  कोई चीज गड़बड़ है और हम बोलें कि व्यवस्था गड़बड़ है। तो जनरलाइज हो जाता है। व्यवस्था में पूरा देश आ गया। भारत के साथ समस्या यही है। भगदड़ हो जाए, लोग मर जाएं, व्यवस्था जिम्मेदार है। अस्पताल में आग लग जाए, लोग मर जाएं। व्यवस्था जिम्मेदार है। मतलब लोगों की जान सस्ती हो गई गई है। मुझे लगता है समाज भी इम्यून हो गया है। बिल्कुल उसमें कोई प्रतिक्रिया ही नहीं होती। कोई रिएक्शन ही नहीं होता। इसी देश में प्याज के दाम बढ़ने पर सरकारें बदली हैं। इसी देश में नसबंदी ने इंदिरा गांधी की सरकार को गिरा दिया था। ये तो इतनी ज्यादा हृदय विदारक बात है। छोटे बच्चों के मां-बाप सरकारी अस्पताल जा रहे हैं। अस्पताल में डॉक्टर दवा प्रिस्क्राइब करके दे रहे हैं। वह दवाई प्रिस्क्राइब कर रहे हैं जो सरकार द्वारा स्वीकृत है। इन दवाओं की लेबोरटरीज में टेस्टिंग होती है। टेस्टिंग के बाद उनको सर्टिफिकेट मिलता है। ड्रग कंट्रोलर्स उसको देते हैं। उसके बाद वो दवाई डॉक्टर लिखते हैं और उसके बाद मौत हो जाती है। तब सिस्टम जागता है। फिर वो पता लगता है कि अरे इसमें तो यह मिला हुआ है। इसमें तो वो मिला हुआ है। ये तो गड़बड़ है। वो गड़बड़ है। हेल्थ को लेकर के हमारे देश में सबसे बड़ी समस्या यह है कि जो सबसे बुनियादी बातें हैं उन्हीं में सबसे ज्यादा घोटाले होते हैं।

 

पूर्णिमा त्रिपाठी: हमारे देश में आम लोगों की जान बहुत सस्ती हो गई है। उसकी कहीं पे कोई कीमत नहीं है। नहीं तो आप इमेजिन करिए 23 बच्चों की मौत अभी तक हो चुकी है और बहुत सारे बच्चे अभी भी क्रिटिकल कंडीशन में हैं। हॉस्पिटल में भर्ती हैं। कितने बचते हैं, कितने नहीं यह आंकड़ा हम बाद में देखेंगे। यह कोई पहली बार ऐसी घटना हुई है। ऐसा भी नहीं है। इसके पहले भी हॉस्पिटल्स में लापरवाही के चलते बच्चों की जान गई है। ऐसी घटना के बाद भी कहीं पर हमें कोई एक्शन होता नहीं दिखाई देता है। सबसे बड़ी त्रासदी वही है। लोगों के अंदर कि इंसानियत जैसे मर गई है। इतने छोटे बच्चों की इस तरह से मौत हो जाती है और कहीं पर कोई प्रतिक्रिया नहीं होती है। ये चीज रुकनी चाहिए। इसमें एक्शन इतना स्ट्रांग होना चाहिए कि लोगों को आगे डर लगे। इस तरह का कुछ करते हुए।
 

अवधेश कुमार: इस बात को समझना पड़ेगा कि जैसे एक समय एक अंडरवर्ल्ड होता था माफियाओं का। अंडरवर्ल्ड ऑर्डर जारी करता था कि इतने पैसे दो उनका दिखाई देता था। इस देश की मुख्यधारा की स्वास्थ्य प्रणाली एक अंडरवर्ल्ड से ज्यादा खतरनाक है क्योंकि वह कुछ क्षेत्रों में जाते थे। आप किसी हॉस्पिटल में भर्ती होंगे। आपके पेशेंट के साथ क्या हो रहा है वो पूछने में आपकी लड़ाई हो जाएगी। आप अगर देखना चाहेंगे क्या हो जाएगा? आपको प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा। इस ढंग से कैदखाने में बदल दिया गया है। आधुनिक प्रणाली के नाम पर और कौन सी दवा लिखी जा रही है? उस दवा में क्या इक्वेशन है? डॉक्टर क्यों लिख रहा है? कहां से वो दवा आ रही है? उसके रेट में कितने घपले हैं? यह जानने का किसी भी पेशेंट या पेशेंट के जो साथ जो उनके रिश्तेदार हैं, परिवार हैं, उनको अधिकार नहीं है। एक तरह से जहर देकर बच्चों को मार दिया गया है। यह भयावह है। ऐसी अनेक दवाइयां हमारे यहां बन रही हैं। ये एक बड़ा सवाल है।
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राकेश शुक्ल: मुझे लगता है जो घटना मध्य प्रदेश में हुई और 23 बच्चों की मौत हुई, उसमें मध्य प्रदेश सरकार का बैकग्राउंड जानना जरूरी है। 2017 में उन दवाइयों का अनुबंध किया गया जो प्रतिबंधित थीं।  2017 में जो एग्रीमेंट हुआ जिन दवाइयों का यानी प्रतिबंधित दवाइयों को जो एग्रीमेंट किया गया 2022, 2023 में वो कंटिन्यू रहा, वो दवाइयों का प्रतिबंध खत्म नहीं हुआ। जो नए हेल्थ सेक्रेटरी आए उन्होंने उसको कंटिन्यू रखा। मौजूदा हेल्थ सेक्रेटरी हैं संदीप यादव जी उन्होंने भी उसको कंटिन्यू रखा है। सिस्टम दुरुस्त करना है तो 2017 के हेल्थ सेक्रेटरी पर भी कारवाई होनी चाहिए। 2020 के हेल्थ सेक्रेटरी पर भी कारवाई होनी चाहिए। और 2025 में जो हेल्थ सेक्रेटरी है उस पर भी कारवाई होनी चाहिए। प्रतिबंधित दवाइयों के साथ अनुबंध करके मध्य प्रदेश में वितरण का दरवाजा खोलने वाले लोगों पर भी कारवाई हो और उनकी भी गिरफ्तारी होनी चाहिए।
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