कालेधन के खिलाफ अभियान के रूप में लिए गए नोट बंदी के फैसले ने देश के सियासी समीकरण के तानेबाने को उलझाना शुरू कर दिया है। सरकार की अपनों से तल्खी बढ़ी है मगर इसके बदले में कई विरोधी दल अचानक उसके करीब भी आए हैं। विपक्ष के कई दल भी जाने आने एक मंच पर आने पर मजबूर हुए हैं।
इस फैसले ने सबसे ज्यादा असर बिहार की राजनीति पर डाला है, जहां मुख्यमंत्री नीतीश के पीएम मोदी के फैसले के पक्ष में खड़ा होने के बाद सत्तारूढ़ महागठबंधन का विवाद सड़क पर आ गया है। इसके अलावा उड़ीसा-तेलंगाना के मुख्यमंत्रियों नवीन पटनायक और चंद्रशेखर राव का नोट बंदी के फैसले के साथ खड़े होने की घटना ने केंद्र की राजनीति में नए तरह के समीकरण उभरने का संकेत दिया है। इसके अलावा नोट बंदी ने कई विपक्षी दलों को जाने अनजाने एकजुट होने का बड़ा अवसर पैदा कर दिया है।
नोट बंदी के फैसले ने देश के सियासी समीकरण में बदलाव की स्थिति भी पैदा कर दी है। एक तरह सरकार में शामिल शिवसेना इस फैसले पर अपनी तल्खी नहीं छिपा रही तो दूसरी ओर जदयू, बीजेडी, टीआरएस जैसे दल सरकार के फैसले के पक्ष में खड़े हो गए हैं। हालत यह है कि इस कारण बिहार में सत्तारूढ़ महागठबंधन दो फाड़ हो गया है और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर राजद ने खुला हमला बोला है।
स्थिति यहां तक आ पहुंची है कि राजद ने नीतीश को खुल कर भाजपा के साथ चले जाने की सलाह दी है तो भाजपा ने नीतीश को महागठबंधन में शामिल होने पर पुनर्विचार करने की सलाह दे दी है। नीतीश ने नोट बंदी केबाद हो रही परेशानी को दूर करने के लिए सरकार की ओर से बनाई गई सब कमेटी में शामिल होने की सैद्घांतिक सहमति दे कर कयासों का बाजार गर्म कर दिया है। जबकि इस फैसले के पक्ष में बीजेडी और टीआरएस के भी खड़े होने के अलग राजनीतिक निहितार्थ निकाले जा रहे हैं।
नई नहीं है नीतीश-भाजपा की नजदीकी
यही स्थिति विपक्षी दलों की भी है। कई मुद्दों और नेतृत्व के सवाल पर तीखे मतभेद के बावजूद कई दल जाने अनजाने एक मंच पर आ गए हैं। खासतौर से संसद में जिस प्रकार इस एक मुद्दे ने कांग्रेस, टीएमसी, सपा, बसपा, राजद, आप, इनेलो, अन्नाद्रमुक, वाम दल को एकजुट किया है, उससे भविष्य में नए सियासी समीकरण तैयार होने का अवसर पैदा हुआ है। सड़क पर जुगलबंदी के तार-तार होने के बावजूद इससे विपक्ष के एकजुट होने की संभावना बढ़ी है।
दरअसल सत्ता बचाने के लिए विधानसभा चुनाव से पूर्व जदयू-राजद साथ तो हो गए, मगर नीतीश और राजद सुप्रीमो की नहीं निभी। प्रतिकूल परिणाम आने के बावजूद भाजपा ने नीतीश से रिश्ते खराब नहीं किए। इसकी पहली बानगी तब सामने आई जब कालीकट में पार्टी ने अपने राष्ट्रीय परिषद की बैठक में दीनदयाल जन्मशती वर्ष समिति में नीतीश के रूप में इकलौते मुख्यमंत्री को जगह दी।
बताते हैं कि जदयू-राजद में मतभेद तब शुरू हुआ जब राजद की ओर से जदयू को पांच साल तक समर्थन देने के बदले ढाई-ढाई साल का एक दूसरे को समर्थन का प्रस्ताव भेजा गया। इसके बाद नीतीश की भाजपा के एक शीर्ष नेता से मुलाकात की खबरें आई। फिर एकजुट विपक्ष के नोट बंदी के विरोध के बीच नीतीश इस फैसले के समर्थन में खड़े नजर आए। राजद में नाराजगी तब और बढ़ गई जब सरकार की ओर से लोगों की परेशानी दूर करने केलिए बनाई गई सबकमेटी में शामिल होने पर नीतीश ने सैद्घांतिक सहमति दे दी।