पूर्व सांसद बोस ने कहा कि मेरी मां 1945 में नेताजी के गायब हो जाने और उनके 1945 के बाद के अस्तित्व को लेकर फर्जी कहानियों से बहुत नाराज थीं। उन्होंने कहा, इसमें कोई संदेह नहीं है कि वह हवाई दुर्घटना में मारे गए थे।
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नेताजी और उनके परपोते सुगाता बोस
- फोटो : सोशल मीडिया
नेताजी के परपोते और प्रसिद्ध इतिहासकार सुगाता बोस ने आरोप लगाया कि नेताजी की लोकप्रियता का फायदा उठाने के लिए अवसरवादियों ने उनके गायब होने और उनके 1945 के बाद के जीवन के अस्तित्व को लेकर फर्जी कहानियां फैलाई हैं। उन्होंने कहा कि इससे बोस के परिवार में कई लोगों को बहुत पीड़ा हुई है।
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सुगाता बोस ने मां की लिखी किताब का हवाला दिया
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कृष्णा बोस
- फोटो : सोशल मीडिया
हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के गार्डिनर चेयर बोस ने कहा, इसमें कोई शक नहीं है कि वह विमान दुर्घटना में मारे गए थे। उन्होंने उस तरीख के बाद से उनके रहस्यमय ढंग से गायब होने की बातों को खारिज किया। उन्होंने कहा कि उनकी दिवंगत मां कृष्णा बोस ने 'नेताजी सुभाष चंद्र बोस का जीवन और संघर्ष' किताब लिखी है जो उनके बचपन से नश्वर अंत तक के जीवन के बारे में बताती है जिसमें 1945 की सच्चाई को स्पष्ट रूप से बताया गया है।
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बोस की मौत को लेकर फर्जी कहानियों से नाराज थीं कृष्णा बोस
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नेताजी सुभाष चंद्र बोस
पूर्व सांसद बोस ने कहा कि मेरी मां 1945 में नेताजी के गायब हो जाने और उनके 1945 के बाद के अस्तित्व को लेकर फर्जी कहानियों से बहुत नाराज थीं। उन्होंने कहा, इसमें कोई संदेह नहीं है कि वह हवाई दुर्घटना में मारे गए थे। उसके बाद उनकी मौजूदगी के बारे में सभी सिद्धांतों का कोई आधार नहीं है।
'नेताजी की अस्थियों उचित सम्मान दिया जाना चाहिए'
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नेताजी सुभाष चंद्र बोस
- फोटो : pti
एक सवाल के जवाब में उन्होंने कहा कि अगर जापान के रेंकोजी मंदिर में रखी गई नेताजी की अस्थियां देश लाई जाती हैं तो उसका उचित तरीके से सम्मान किया जाना चाहिए। किताब में एक अध्याय में चश्मदीद आबिद हसन (सुभाष चंद्र बोस के दल का सेनानी) दुर्घटना सिद्धांत की पुष्टि करता है।
आबिद हसन ने कृष्णा बोस को भीषण दुर्घटना के बारे में बताया था
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आबिद हसन के साथ नेताजी
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आजाद हिंद फोज में सुभाष चंद्र बोस के भरोसेमंद सहयोगी आबिद हसन ने पूर्व सांसद कृष्णा बोस को अगस्त 1945 में बैंकॉक से साइगॉन तक की हवाई यात्रा और भीषण दुर्घटना के बारे में बताया था। सुगाता बोस ने बताया, मां का आबिद हसन के साथ कई दिनों तक मैराथन साक्षात्कार हुए जो उन्होंने 1976 में नेताजी रिसर्च ब्यूरो से लगभग दो किलोमीटर दूर हमारे घर बसुंधरा में आयोजित किए थे।
आजादी के बाद राजनयिक बने हसन ने कृष्णा बोस को बताया था कि कैसे वे 1941 के मध्य में जर्मनी में नेताजी के संघर्ष में शामिल हुए और 1943 के पूर्वार्ध में उत्तरी यूरोप से पूर्वी एशिया के लिए 93 दिनों की महत्वपूर्ण पनडुब्बी यात्रा में शामिल हुए।