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निजी स्कूलों के बच्चों के कंधों पर ज्यादा बोझ, शारीरिक वजन का 10 फीसदी हो स्कूली बस्तों का बोझ

Mon, 06 Aug 2018 07:39 PM IST
हरेन्द्र, नई दिल्ली
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स्कूल बैग
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बच्चों के स्कूली बस्तों के बढ़ते बोझ कम करने की कवायद शुरू हो गई है। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने बस्तों का बोझ घटाने को लेकर कई सैद्धांतिक और व्यवहारिक समाधान सुझाए हैं। आयोग का कहना है कि सरकारी स्कूलों के मुकाबले प्राइवेट स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के बस्तों का बोझ ज्यादा भारी होता है। साथ ही, प्राइवेट स्कूल निर्धारित पाठ्यक्रम का अनुपालन नहीं करते और निजी प्रकाशकों की पुस्तकें पढ़ाते हैं।
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स्कूली बस्तों का बोझ बच्चों के वजन का 10 फीसदी हो

मानव संसाधन विकास मंत्रालय को भेजे सुझावों में राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने कहा है कि पाठ्य पुस्तकों को मासिक शिक्षण योजना के आधार पर विभाजित किया जाना चाहिए। साथ ही निचली कक्षाओं के लिए शिक्षा के अधिकार अधिनियम, 2009 में बदलाव होना चाहिए कि बच्चों के स्कूली बस्तों का बोझ उनके कुल शारीरिक वजन का 10 फीसदी होना चाहिए। 

बस्तों के बोझ को नहीं मिली राइट टू एजुकेशन में जगह

राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग के सदस्य प्रियांक कानूनगो ने अमर उजाला को बातचीत को बताया कि पिछले 70 सालों से हमारी शिक्षा प्रणाली कई समस्याओं और चुनौतियों का सामना कर रही है। लेकिन स्कूली बस्तों के बढ़ते वजन और उससे बच्चों की सेहत पर पड़ रहे दुष्प्रभावों को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई है। यहां तक कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 में भी इसे जगह नहीं दी गई। 
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प्राइवेट स्कूल बढ़ाते हैं बस्तों का बोझ

एक माह का पाठ्यक्रम हो एक किताब में

मंत्रालय को भेजे सुझावों के मुताबिक अगर किताबें मासिक शिक्षण योजना के आधार पर विभाजित की जाती हैं, सभी विषयों के एक माह के पाठ्यक्रम को एक किताब में रखा जाना चाहिए, जिससे न केवल बस्तों का बोझ घटेगा बल्कि सभी विषयों के लिए अलग से किताबें भी नहीं ढोनी पड़ेंगी। 

ग्लैज पेपर में न हो छपाई

आयोग ने अपनी सिफारिशों कहा है कि एनसीईआरटी को किताबें, कागज या कापी की गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए किताबों की गुणवत्ता को बदल कर जैसे ग्लैज पेपर की बजाय साधारण कागज में छपाई होनी चाहिए, जिससे किताबें हल्की होंगी और बोझ कम होगा। 

प्राइवेट स्कूल बढ़ाते हैं बस्तों का बोझ

कानूनगो के मुताबिक आयोग ने अपने सर्वे में पाया कि देश में कुल स्कूलों की संख्या में प्राइवेट स्कूलों 23.7 फीसदी हैं और निजी स्कूल ज्यादा कमीशन के चक्कर में पाठ्यक्रम से बाहर की किताबों की सिफारिश करते हैं, और बस्तों का बोझ बढ़ाते हैं।

जबकि शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009 की धारा 29 के मुताबिक यह स्पष्ट है कि एनसीईआरटी एक शैक्षिक प्राधिकरण है, और मान्यता प्राप्त कोई भी स्कूल बच्चों और उनके पेरेंट्स को एनसीईआरटी से बाहर की किताबें खरीदने के लिए बाध्य नहीं कर सकता। 
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कंधे बराबर रखने की ट्रेनिंग दी जाए

एनसीईआरटी बनाए टाइमटेबल

आयोग का मानना है कि एनसीईआरटी को एजुकेशनल अथॉरिटी होने के नाते सभी राज्यों को क्लासरूम के हिसाब से टाइमटेबल देना चाहिए। जिसमें रोजाना सभी विषयों को पढ़ाना अनिवार्य न हो। साथ ही राज्यों के पास यह अधिकार हो कि वह अपनी जरूरत के मुताबिक उसमें बदलाव कर सकें।  

कंधे बराबर रखने की ट्रेनिंग दी जाए

साथ ही आयोग को विभिन्न शिक्षण संस्थानों और शिक्षाविदों से कई अन्य सुझाव भी मिले। इन सुझावों में पाठ्यपुस्तकों को स्कूल में ही रखने की व्यवस्था होनी चाहिए। साथ ही नोटबुक 100 से 120 पेजों की हों। इसके अलावा पीठ के ऊपरी हिस्से पर फिट होने वाले छोटे बस्ते देने और स्कूली बस्ता उठाते समय रीढ़ की हड्डी को सीधी रखने और कंधे बराबर रखने की ट्रेनिंग मिलनी चाहिए।

साथ ही बच्चों को स्कूलों में साफ पेयजल की सुविधा देने जैसी मांग भी की गई ताकि पानी की बोतलों से बच्चों पर अतिरिक्त बोझ न पड़े। 
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