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राजनीति के सरदार हैं एनसीपी के शरद पवार

Thu, 29 Mar 2018 03:58 PM IST
शशिधर पाठक, अमर उजाला, नई दिल्ली
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एनसीपी प्रमुख शरद पवार
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एनसीपी के शरद पवार एक बार फिर नई भूमिका में हैं। वह गैर भाजपा दलों की अगुआई कर रही कांग्रेस पार्टी के सबसे मजबूत सहयोगी बनते जा रहे हैं। सत्ता गलियारे में यह चर्चा आम है कि पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को वह समझाने में सफल रहे और ममता गैर भाजपा और गैर कांग्रेस मोर्चा जैसे प्रयास को छोड़कर विपक्षी एकजुटता के प्लेटफॉर्म पर आने के लिए राजी हो गई हैं।

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फिलहाल यूपीए चेयरपर्सन सोनिया गांधी भी शरद पवार की सलाह को काफी अहमियत दे रही हैं। उनके विरोधियों से भी पूछिए तो यहां तक कह देते हैं कि शरद पवार असल में राजनीति के सरदार हैं।

अपनों से ज्यादा विरोधी रहे दोस्त
शरद पवार के व्यक्तित्व की खूबी है कि हमेशा अपनों से ज्यादा विरोधी उनके दोस्त रहे। कहा जाता है कि यही वजह रही कि राजनीति में 51 साल पहले बतौर एमएलए से शुरू हुए सफर की चमक कभी फीकी नहीं पड़ी।
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वह महाराष्ट्र की राजनीति करते हुए शिवसेना के संस्थापक बालासाहेब ठाकरे के जितने करीबी रहे, महाराष्ट्र नव निर्माण सेना के राज ठाकरे और शिवसेना के प्रमुख उद्धव ठाकरे से उनकी उनती ही निभती है। कांग्रेस और यूपीए सरकार के विरोध में उभरे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जब गुजरात के मुख्यमंत्री थे तब भी पवार से गहरी निभती थी। 

प्रधानमंत्री बनने के बाद भी शरद पवार को प्रधानमंत्री से करीब का रिश्ता निभाते हुए देखा गया। सूचना एवं प्रसारण मंत्री स्मृति ईरानी को जब पहली बार राज्यसभा पहुंचने का अवसर मिला तो शरद पवार ने इसमें उनकी अच्छी सहायता की थी। पवार की आदत है कि वह समय को भांपकर दल और दल से बाहर के लोगों पर भी शुभचिंतक बनकर हाथ फेर देते हैं।

शरद पवार ने अपने व्यक्तित्व की डिजाइन कुछ इस तरह से की है कि वह अपनी स्वतंत्रता, दोस्ती, नाराजगी को मन मुताबिक आकार दे लेते हैं। दोस्त न तो इसका लंबे समय तक बुरा मान पाते हैं और न ही विरोधी दुश्मन बन पाते हैं।

इसका एक उदाहरण गुजरात में 2017 में संपन्न हुआ राज्यसभा चुनाव भी है। इसके तिलिस्म को भेदना बहुत आसान नहीं है। रिश्ते के बारे में यह चर्चा भी आम रहती है कि शायद ही समाज के किसी तबके या वर्ग से जुड़े लोगों से शरद पवार के संबंध न रहे हों। वह दरबारी से लेकर दीवान तक सबसे एक रिश्ता रखते हैं। फिलहाल वह अगली पंक्ति में बैठकर क्षेत्रीय और केंद्रीय संसदीय राजनीति करने वालों में संभवत सबसे वरिष्ठ राजनेता हैं।
 

समय के पारखी हैं पवार

शरद पवार समय के पारखी हैं। 1956 में जब वह छात्र जीवन में थे तब गोवा की स्वतंत्रता (अलग राज्य का दर्जा) के लिए प्रदर्शन करने उतरे थे लेकिन 11 साल बाद पहली बार 1967 में कांग्रेस पार्टी के टिकट पर बारामती विधानसभा सीट से विधायक चुने गए। 

यशवंतराव चव्हाण को अपना राजनीतिक गुरू मानने वाले शरद पवार ने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। जब चाहा कांग्रेस से नाता तोड़ा और जब चाहे उसके सहयोगी बनकर आगे आए। 1978 में कांग्रेस से अलग हो गए। उनके नेतृत्व वाले प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट ने जनता पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाई और शरद पवार पहली बार मुख्यमंत्री बने। फरवरी 1980 में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली सरकार सत्ता में लौटी तो पवार की सरकार को जाना पड़ा। 

1983 में पवार इंडियन नेशनल कांग्रेस (सोशलिस्ट) यानी कांग्रेस (एस) के अध्यक्ष बने। 1984 में बारामती का प्रतिनिधित्व करते हुए लोकसभा सदस्य बने, लेकिन 1985 में विधानसभा चुनाव में विधानसभा सदस्य बनने के बाद उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया। 

इस चुनाव में कांग्रेस (एस) ने 288 सदस्यीय विधानसभा में 54 सीट जीती थी। लिहाजा पवार ने क्षेत्रीय राजनीति को वरीयता दी और महाराष्ट्र विधानसभा में बतौर नेता प्रतिपक्ष भूमिका का निर्वहन किया। लेकिन 1987 में शिवसेना के महाराष्ट्र में उभार और कांग्रेस कल्चर को महाराष्ट्र में सशक्त बनाने का कारण बताकर वह फिर कांग्रेस में लौट आए।

जून 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री शंकरराव चव्हाण को केंद्रीय वित्त मंत्री बनाने का निर्णय लिया और शरद पवार दूसरी बार मुख्यमंत्री बनाए गए। 04 मार्च 1990 को चुनाव के बाद वह फिर तीसरी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने।

केंद्रीय राजनीति
26 जून 1991 के बाद से शरद पवार ने केंद्रीय राजनीति में अपनी दिलचस्पी बढ़ा दी। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के बाद पवार का नाम प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के तौर पर लिया जा रहा था। हालांकि वह प्रधानमंत्री नहीं बन पाए लेकिन 26 जून 1991 को वह नरसिंहाराव की सरकार में रक्षा मंत्री बनाए गए। लेकिन मार्च 1993 में वह सुधाकरराव नाइक को पद से हटाए जाने के बाद फिर राज्य सरकार का नेतृत्व करने के लिए महाराष्ट्र भेजे गए। चौथी बार राज्य के मुख्यमंत्री बने। बतौर मुख्यमंत्री शरद पवार की राजनीति काल का यह सबसे विवादित दौर रहा। उन पर तमाम आरोप भी लगे। 1995 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस पार्टी सत्ता में आने से रह गई।

केंद्र और क्षेत्र दोनों में सक्रिय
शरद पवार ने 1995 में कांग्रेस के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में पिछड़ने के बाद केंद्रीय और क्षेत्रीय राजनीति दोनों को साधना शुरू किया। उन्होंने कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी को भी 1997 में चुनौती दी। हालांकि सफल नहीं हो पाए। 1998 में वह बारामती से लोकसभा का चुनाव जीते। 12वीं लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का दायित्व निभाया। 

जून 1999 में एक बार फिर पवार की राजनीति ने करवट लिया और वह इटली मूल की सोनिया गांधी का मुद्दा उठाते हुए पीए संगमा, तारिक अनवर के साथ कांग्रेस से अलग हो गए। नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) का गठन कर लिया। लेकिन 1999 के विधानसभा चुनाव के बाद महाराष्ट्र में जो सरकार बनी वह कांग्रेस और एनसीपी के गठबंधन की थी। इसके मुख्यमंत्री कांग्रेस के विलास राव देशमुख तो उपमुख्यमंत्री एनसीपी के छगन भुजबल थे। यह पवार का सटीक दांव माना गया।
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कांग्रेस से अलग होकर बनाए रखा वजूद

2004 में शरद पवार की एनसीपी यूपीए में शामिल हुई। मनमोहन सिंह प्रधानमंत्री बने और उनकी कैबिनेट में शरद पवार कृषि मंत्री। 2012 में ही उन्होंने युवा पीढ़ी को अवसर देने की घोषणा करते हुए लोकसभा चुनाव न लड़ने का निर्णय लिया। उनकी बारामती सीट का प्रतिनिधित्व पवार की बेटी सुप्रिया सदानंद सूले करती हैं और शरद गोविंद राव पवार एनसीपी की केंद्रीय राजनीति की कमान संभालते हैं। मौजूदा समय में उनकी राजनीति के प्रमुख सारथी प्रफुल्ल पटेल हैं। प्रफुल्ल पटेल पवार की राजनीति की डिजाइन को मूर्त रूप देते हैं।

हार नहीं मानी
शरद पवार राजनीति के उन विरले खिलाड़ियों में हैं, जिन्होंने हार नहीं मानी। हर आरोप के दौर से गुजरे और बाहर आए। कांग्रेस में रहे, कांग्रेस से अलग हुए और कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाई। कांग्रेस के ही नेतृत्व वाले यूनाइटेड प्रोग्रेसिव एलायंस (यूपीए) गठबंधन में शामिल होकर केंद्रीय मंत्री भी बने। धर्मनिरपेक्षता की राजनीति की। शरद पवार के शब्दों में उन्होंने वास्तव में कांग्रेस के राजनीतिक कल्चर को जीवित रखा।

बदलने के संकेत
शरद पवार समय के पारखी हैं। उनकी सक्रियता केंद्रीय और देश की राजनीति में लगातार बड़े बदलाव का संकेत दे रही है। पवार कभी निभाने के लिए दुश्मनी मोल नहीं लेते। इस समय वह काफी सक्रिय हैं। विपक्षी एकता की धुरी बने हैं। उत्तर भारत में शरद यादव दलों को कांग्रेस के साथ खड़े होने के लिए साध रहे हैं तो शरद पवार की भी भूमिका कम नहीं है।

माकपा और उसकी धुर विरोधी तृणमूल कांग्रेस को यूपीए में लाने का फार्मूला तैयार हो रहा है तो उ.प्र. में बसपा- सपा को भी एक छत के नीचे आने का आमंत्रण भेजा जा रहा है। साझा न्यूनतम कार्यक्रम की एक रूपरेखा पर भी काम चल रहा है। बिहार में राजनीति का समीकरण बिठाने में शरद यादव भी लगातार लगे हैं। सब कुछ 2019 के लिए हो रहा है। मकसद एक है। केंद्र और देश में गैर भाजपा राजनीति की जड़े मजबूत करनी है।
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