असम में एनआरसी के ताजा ड्राफ्ट पर गरमाई राजनीति से पूरा देश तप रहा है। इसकी बड़ी वजह यह है कि इस ड्राफ्ट में 40 लाख से ज्यादा लोगों के नाम इसमें से गायब हैं। ऐसा माना जा रहा है कि जिनके नाम इस ड्राफ्ट में नहीं हैं इसमें अधिकतर लोग वह हैं जो अल्पसंख्यक और अवैध बांग्लादेशी हैं। हालांकि एनआरसी ड्राफ्ट को अंतिम रूप दिया जा रहा है। सरकार ने इस बात का भरोसा दिया है कि जो भारतीय हैं उनका नाम इसमें जुड़ जाएगा। इस बीच मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस रंजन गोगोई और आरएफ नरीमन ने असम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर समन्वयक प्रतीक हाजेला और पंजीयक शैलेश को एनआरसी ड्राफ्ट के अंतिम रूप देने के लिए अपनाई जा रही प्रक्रिया के बारे में मीडिया से बात करने पर फटकार लगाई है।
हालांकि, अवैध बांग्लादेशियों की समस्या से पूरा भारत जूझ रहा है। लेकिन एक बात चौंकाती है कि जब इन समस्या से पूरा भारत जूझ रहा है तो फिर इस तरह की गणना असम में ही क्यों हुई?
पढ़िए वो सबकुछ जो आप एनआरसी के बारे में जानना चाहते हैं।
नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन यानी एनआरसी के संशोधित ड्राफ्ट में असम के 2.89 करोड़ लोगों को नागरिक मान लिया गया है। मगर 40,07,708 लोगों के नाम इसमें शामिल नहीं हैं। इसलिए कि वे अपनी पहचान फिलहाल साबित नहीं कर पाए और इनमें अधिकतर अवैध बांग्लादेशी होने की आशंका है। हालांकि अवैध बांग्लादेशियों की समस्या सिर्फ असम में नहीं है। केंद्र सरकार दो करोड़ से ज्यादा अवैध बांग्लादेशियों के भारत में होने की बात कह चुकी है। 2016 में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरण रिजीजू ने राज्यसभा में एक सवाल के जवाब में यह आंकड़ा पेश किया था। इधर, खुफिया विभाग की रिपोर्ट है कि 55 लाख बांग्लादेशी तो पश्चिम बंगाल में ही हैं। यानी एनआरसी ड्राफ्ट में असम के जितने लोग नागरिकता साबित नहीं कर सके उनसे 15 लाख ज्यादा।
क्या है एनआरसी ड्राफ्ट
1951 में नागरिकों तथा उनके घरों की गिनती के उद्देश्य से कार्यक्रम नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन (एनआरसी) चलाया गया। तब 80 लाख लोगों को वहां का नागरिक माना गया था। लंबे समय से असम में स्थायी नागरिक संगठनों की मांग रही है कि इस गणना को अपडेट किया जाए। 1985 में भी इस मांग ने जोर पकड़ा तब देश के प्रधानमंत्री राजीव गांधी थे। लेकिन बाद में 2010 में पायलट प्रोजेक्ट के तहत राज्य के दो जिलों में एनआरसी अपडेट करने की प्रक्रिया शुरू हुई। हालांकि कुछ समूह इसके विरोध में उतर आए। विरोध में प्रदर्शन भी हुए। बारपेटा जिले में पुलिस को उग्र प्रदर्शनकारियों पर कार्रवाई करनी पड़ी, इसमें 4 लोगों की मौत हो गई। तब नए सिरे से गणना के काम को रोक दिया गया। 2013-14 में सुप्रीम कोर्ट के सख्त निर्देशों के बाद एनआरसी को अपडेट करने का काम फिर शुरू हुआ।
ऐसा माना जाता रहा है कि देश में दो करोड़ से ज्यादा अवैध बांग्लादेशी हैं जिसमें से 55 लाख बंगाल में और 15 लाख से ज्यादा असम में हैं। लेकिन इनका 40 लाख होना अंचभित करता है।
यह गणना सिर्फ असम में ही क्यों
अब सवाल ये उठता है कि गणना सिर्फ असम में ही क्यों
नागरिकता के पैमाने अन्य राज्यों की तुलना में असम में बिलकुल अलग हैं। ऐसा वहां के पलायन के इतिहास को देखते हुए है। ब्रिटिश शासन के दौरान असम को बंगाल प्रेसीडेंसी में शामिल कर लिया गया था। 1826 से 1947 तक ब्रिटिश अधिकारी चाय बागानों के लिए दूसरे प्रांतों से यहां सस्ते मजदूर लाते रहे। मगर आजादी के बाद यहां दो बार पलायन का बड़ा दौर आया।
पहला- भारत तथा पाकिस्तान के बंटवारे के वक्त, पूर्वी पाकिस्तान से। दूसरा- 1971 में पूर्वी पाकिस्तान से टूटकर बांग्लादेश बनने के बाद। 1979 से 1985 के बीच इस माइग्रेशन का जमकर विरोध हुआ। इसका नेतृत्व ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (आसू) ने किया था।
इसी वजह से 1985 में राजीव गांधी सरकार ने आसू और अन्य संगठनों के साथ असम अकॉर्ड समझौता किया। इसमें अवैध प्रवासियों की पहचान करने और उन्हें वापस भेजने का प्रावधान था। इसके लिए नागरिकता अधिनियम में अनुछेद-6ए जोड़ा गया, जिसमें असम के लिए विशेष प्रावधान किए गए।
आखिर कौन है असम का नागरिक
किसे माना गया असम का नागरिक
असम का वैध नागरिक तय करने के लिए कुछ विशेष प्रावधानों के तहत व्यवस्थाएं की गईं और इसी आधार पर एनआरसी ड्राफ्ट किया गया। इसके तहत- 1 जनवरी 1966 से पहले असम में रहने वाला हर व्यक्ति यहां का नागरिक माना गया।
1 जनवरी 1966 से 25 मार्च 1971 के बीच असम आए विदेशियों को फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के पास रजिस्ट्रेशन करवाना अनिवार्य हुआ। नागरिक के तौर पर इन्हें सभी अधिकार दिए गए, लेकिन मतदान का अधिकार 10 साल बाद देने की शर्त रखी गई।
25 मार्च 1971 को या इसके बाद असम में आने वाले किसी भी प्रवासी को नागरिकता का अधिकार नहीं दिया गया। अब एनआरसी के लिए आवेदकों को यह साबित करना पड़ रहा है कि वे या उनके पूर्वज इस तारीख से पहले असम के नागरिक थे।
कब आई इस मामले में तेजी
2013 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद एनआरसी सूची अपडेट करने के काम में तेजी आई। दरअसल 2009 में एक एनजीओ की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे पर सुनवाई शुरू की थी। 2013 में कोर्ट ने इस लिस्ट को अपडेट करने का आदेश दिया। 2014 के बाद राज्य के 3.29 करोड़ लोगों ने नागरिकता साबित करने के 6.5 करोड़ दस्तावेज भेजे। इनमें से 2,89,38,677 लोगों को नागरिकता के लिए योग्य पाया गया है।
अब इन 40 लाख लोगों का क्या होगा
बड़े नाम जो सूची से रह गए बाहर
* पूर्व राष्ट्रपति के भतीजे: फखरुद्दीन अली अहमद के भतीजे जियाउद्दीन अली अहमद भी इस सूची से गायब हैं।
* असम की एकमात्र महिला मुख्यमंत्री : सैयदा तैमूर दिसंबर 1980 से जून 1981 तक राज्य की मुख्यमंत्री रहीं, इस सूची में उनका नाम नहीं है।
* रिटायर्ड आर्मी ऑफिसर : अजमल हक 1986 से 2016 तक तीस साल सेना में रहे। इस ड्राफ्ट में इनका, इनके बेटा-बेटी का नाम भी नहीं है।
* विधायक व विधायकों के परिजन: एआईयूडीएफ के विधायक अनंत कुमार मालो, बीजेपी विधायक दिलीप कुमार पाल की पत्नी अर्चना, उल्फा नेता परेश बरुआ की पत्नी व बेटे के नाम नहीं हैं।
अब इन 40 लाख लोगों का क्या होगा
जिनका नाम इस सूची में नहीं है, उनके पास अभी भी दावा करने का मौका है। एनआरसी समन्वयक ने कहा कि इस लिस्ट के आधार पर किसी भी नागरिक को फिलहाल डिटेंशन सेंटर में नहीं भेजा जाएगा।
चिंता, क्योंकि आबादी तेजी से बढ़ी
देश में 1961 से 1971 तक 25 फीसदी आबादी बढ़ी। क्योंकि पूर्वी पाकिस्तान से बड़ी संख्या में लोग असम में आ गए। असम में 1971 से 1978 के 7 साल में मतदाताओं की संख्या 50 फीसदी बढ़ गई। क्योंकि 1971 में भारत-पाक युद्ध हुआ। युद्ध के बाद पाकिस्तान का बटवारा हुआ जिसके बाद भारत में लोगों की घुसपैठ हुई।
असम में किस धर्म के लोगों की कितनी आबादी?
असम में धर्म के आधार पर आबादी
2011 की मतगणना के अनुसार असम की कुल आबादी- 3.12 करोड़
* हिंदू : 1.92 करोड़ (कुल आबादी का 61.47%), 2001 की तुलना में राज्य में हिंदुओं की आबादी घटी।
* मुस्लिम : 1.07 करोड़ (कुल आबादी का 34.22%), 2001 की तुलना में राज्य में मुस्लिमों की आबादी बढ़ी। 14 में से नौ जिलों में ये 20 फीसदी से ज्यादा।
कब, कितने अवैध प्रवासी घुसे?
30 लाख:
10 अप्रैल 1992 को तत्कालीन मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया ने यह आंकड़ा बताया था। लेकिन इसके दो दिन बाद ही वे अपने बयान से मुकर गए। (स्रोत: संसद में पेश रिपोर्ट, जनगणना 2001 व 2011 तथा इंटेलीजेंस रिपोर्ट्स।)
असम में 1961 से 1971 तक 35 फीसदी आबादी बढ़ी।
एक करोड़:
6 मई 1997 को तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री इंद्रजीत गुप्ता ने अवैध प्रवासियों की यह संख्या संसद में बताई थी।
* ईसाई : 11.67 लाख (कुल आबादी का 3.73%)
* सिख : 20,672 (कुल आबादी का 0.06 %)
* बौद्ध : 54,993 (कुल आबादी का 0.17 %)
* जैन : 25,949 (कुल आबादी का 0.09 %)
* अन्य धर्म : 27118 (कुल आबादी का 0.09 %)
असम में आबादी की वृद्धि दर औसत 17% रही, पर 27 में से 14 जिलों में इससे कहीं ज्यादा है।
41 लाख:
2009 में एनजीओ असम पब्लिक वर्कर्स ने जनहित याचिका में इस आंकड़े का जिक्र किया। चुनाव आयोग ने भी खंडन नहीं किया।
जानिए इस हफ्ते क्या हुआ एनआरसी मुद्दे पर
इस हफ्ते क्या घटा एनआरसी मुद्दे पर
30 जुलाई, सोमवार
सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजन का अंतिम ड्राफ्ट जारी किया। इसमें असम में रह रहे 40 लाख लोगों के नाम नहीं थे। इनमें दो विधायक भी शामिल थे। गृह मंत्रालय के संयुक्त सचिव (पूर्वोत्तर) ने यह साफ किया कि एनआरसी से बाहर के लोग अभी न तो भारतीय हैं, ना ही गैर-भारतीय।
31 जुलाई, मंगलवार
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि असम में फाइनल एनआरसी जारी होने तक किसी पर कार्रवाई न की जाए। बाहर हुए 40 लाख लोगों को निष्पक्ष सुनवाई का मौका मिलना चाहिए। 16 अगस्त को इस पर अगली सुनवाई की बात भी कही।
संसद में हंगामा : राज्यसभा में एक बार स्थगन के बाद दिनभर के लिए कार्यवाही स्थगित रही। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने कहा कि असम समझौता 1985 में राजीव गांधी ने किया था। इसकी आत्मा में एनआरसी था। इन पर अमल करने की हिम्मत हमने दिखाई।
2 अगस्त, गुरुवार
एनआरसी पीड़ितों से मिलने जा रहे तृणमूल के छह सांसद और दो विधायकों को एयरपोर्ट पर हिरासत में ले लिया गया। संसद में भी तृणमूल नेताओं ने इस मुद्दे पर जमकर हंगामा किया।
3 अगस्त, शुक्रवार
संसद में इस पर फिर हंगामा हुआ। गृह मंत्री राजनाथ सिंह को विपक्ष के आरोपों पर सफाई देनी पड़ी। उन्होंने कहा कि यह न तो अंतिम ड्राफ्ट है और न ही अंतिम एनआरसी। जिनके पास जरूरी दस्तावेज हैं, उनका नाम नहीं छूटेगा।
4 अगस्त, शनिवार
असम में अवैध रूप से रह रहे लोगों को पश्चिम बंगाल में बसाने की तैयारी शुरू हो गई। खासतौर से, राज्य की सीमा के साथ लगते जिलों के प्रशासनिक अधिकारियों को विशेष इंतजाम करने की हिदायत दी गई।
5 अगस्त, रविवार
केंद्र गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने लखनऊ में एक कार्यक्रम के दौरान फिर दोहराया कि असम में एनआरसी का ये अंतिम रजिस्टर नहीं है, बल्कि एक ड्राफ्ट है। असम की जनता के पास अपना दावा और आपत्तियां पेश करने के लिए पर्याप्त समय है। केंद्र सरकार ने असम की जनता की मांग पर वहां एनआरसी लागू किया है।
6 अगस्त, सोमवार
असम में एनआरसी के पूर्ण मसौदे के प्रकाशन के बाद मेघालय ने प्रदेश में आने वाले लोगों की कड़ी जांच शुरू कर दी। अधिकारियों ने लोगों को सलाह दी है कि वह अपने साथ नागरिकता पहचान पत्र लेकर ही प्रदेश में प्रवेश करें।
7 अगस्त, मंगलवार
सुप्रीम कोर्ट ने एनआरसी से संबंधित शिकायतों के समाधान के तरीकों के बारे में मीडिया से बात करने पर भारत के महापंजीयक और असम राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर समन्वयक को चेतावनी दी है।