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ट्रक का पहिया पांव के ऊपर से उतर गया, अब वर्ल्ड चैम्पियनशिप में गोल्ड लाने की जिद

Tue, 15 Jan 2019 11:25 AM IST
अमर शर्मा जितेंद्र भारद्वाज, नई दिल्ली
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नेशनल पावर लिफ्टिंग बैंच प्रेस चैम्पियन विक्रम केम - फोटो : Amar Ujala
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उसे बचपन से ही यह जुनून रहा है कि एक दिन अपने देश के लिए मेडल लेकर आए। इसी मकसद को अंजाम तक पहुंचाने के लिए वह दो घंटे सुबह और दो घंटे शाम को जिम में वेट लिफ्टिंग की प्रेक्टिस करता। 28 मई 2005 के दिन वह अपनी बाइक पर जिम में जा रहा था। चिराग दिल्ली चौराहे पर तेज रफ्तार में आ रहे एक ट्रक ने उसे टक्कर मार दी। एक पांव के उपर से ट्रक का अगला पहिया उतर गया। डॉक्टरों ने दो साल बिस्तर पर रखा और फिर सत्तर फीसदी विकलांगता का सर्टिफिकेट देकर घर भेज दिया। ...लगा कि जिंदगी खत्म।
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मगर नहीं। खानपुर निवासी विक्रम केम ने हार नहीं मानी। विकलांगता की स्थिति में एक बार फिर से मुकाम की ओर बढ़ना शुरू किया। टारगेट रखा, वर्ल्ड चैम्पियनशिप में देश के लिए गोल्ड। विक्रम बीती छह जनवरी को नेशनल चैंपियन बना है और स्लोवाकिया में अक्तूबर माह में होने वाली वर्ल्ड चैम्पियनशिप मुकाबले के लिए भी उसका चयन हो गया है।

मां और अंकल ने दिया सहारा तो दोबारा से पैदा हुई गोल्ड की जिद

बतौर विक्रम जब मैं बीए-प्रथम वर्ष में पढ़ रहा था तो वह सड़क हादसा हुआ था। पिता तो बहुत पहले ही चल बसे थे। घर में सबसे छोटा था। सारी जिम्मेदारी मां के कंधों पर आ गई। दो बड़ी बहनों के अलावा वह घर भी संभालती और मुझे भी। पढ़ाई पीछे रह गई थी। दो साल तक जैसे नवजात का लालन-पालन होता है, ठीक वैसे ही मेरे साथ हुआ। मेरा हर काम मां को करना पड़ता। अंकल अरुण गर्ग जब भी आते तो मैं एक ही बात पूछता, "दोबारा कुछ आस है।" गोल्ड मेडल लाने के मकसद का क्या होगा। अंकल ने एक नई हिम्मत दे दी। यह जानते हुए कि मैं 70 फीसदी विकलांगता की श्रेणी में आ गया हूं। खैर, यहां से एक बार फिर नई जिंदगी शुरू हुई। साथ ही एक जिद भी।

रोजाना बस का सफर, जिम का पसीना और नजर वर्ल्ड चैम्पियनशिप पर

साल 2016 में विक्रम की शादी हो गई। पत्नी सौम्या भी एक पांव से पोलियाग्रस्त है। इनका एक बच्चा भी है। शादी के बाद पत्नी ने कभी यह अहसास नहीं होने दिया कि हम दिव्यांग हैं। बिल्कुल नहीं, विक्रम कहते हैं कि उसने हर कदम पर मेरा साथ दिया। अंकल अरुण ने मेरी मुलाकात विश्व विख्यात एवं राजीव गांधी अवार्डी कोच जुगल धवन से कराई। रोजाना बस का सफर शुरू हो गया। 

हर बुधवार और शनिवार को सोनीपत कोचिंग के लिए जाता। कभी-कभी अंकल भी साथ में चल पड़ते। नतीजा, छह जनवरी 2019 को सोनीपत में हुई नेशनल पावर लिफ्टिंग बैंच प्रेस मुकाबले की 90 किलोग्राम श्रेणी में 85 किलो वजन उठाकर नेशनल चैम्पियनशिप का खिताब अपने नाम करा लिया। विक्रम अब यूरोप के स्लोवाकिया में होने वाली वर्ल्ड चैम्पियनशिप में दिव्यांग श्रेणी के मुकाबले की तैयारी में जुट गया है। 

कई विभागों में धक्के खाए, मगर न नौकरी सरकारी मिली, न प्राइवेट

विक्रम को इस बात का अफसोस जरूर है कि उसे न सरकारी नौकरी मिली और न प्राइवेट क्षेत्र में किसी ने कोई मदद की। रेलवे और बैंक में कई बार प्रयास किया मगर सफलता नहीं मिली। कई जगह पर यह भरोसा दिलाया कि वह उनके संगठन की ओर से मेडल जीतेगा, लेकिन किसी ने नहीं सुनी। यहां तक जिम में ट्रेनर की नौकरी मांगने गया तो वहां भी कहा गया कि मैं करूंगा क्या। आज पैसे की दिक्कत तो आ रही है, लेकिन एक जुनून है तो जिसे पूरा करना है। खाना एक समय मिला तो भी ठीक। अब पीछे नहीं हटूंगा। मेरा लक्ष्य है कि डेढ़ सौ किलो या उससे ऊपर तक की बैंच प्रेस मारना। देश के लिए गोल्ड बाबत विक्रम का कहना है कि यह एक सपना नहीं है, बल्कि सार्थक लक्ष्य है। इसे मैं हासिल करूंगा।
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