देश के निजी मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों के मेहनताना को लेकर चल रही मनमानी पर राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (एनएमसी) ने हैरानी जताई है। सख्त नियमों के बाद भी अधिकतर निजी कॉलेज छात्रों को वजीफा नहीं दे रहे हैं। कई कॉलेज बैंक खाते में राशि जमा कराते हैं और उसके कुछ दिन बाद जबरन डॉक्टरों से कैश में पूरा वापस ले लेते हैं।
आयोग का कहना है कि शिकायत के बाद जब इसकी जांच के लिए छात्रों ने अपनी आपबीती सुनाई तो हैरान कर दिया। एनएमसी उप सचिव औजेंद्र सिंह ने सभी मेडिकल कॉलेजों के लिए चेतावनी जारी करते हुए कहा है कि महीने भर में डॉक्टरों को वजीफा नहीं दिया तो कॉलेज की मान्यता रद्द कर दी जाएगी। एनएमसी के अनुसार, पीजी छात्रों की शिकायत पर देश के 21 राज्यों के 231 निजी मेडिकल कॉलेजों में सर्वे कराया गया। इस दौरान 10,178 छात्रों से बातचीत में पता चला कि 7,626 छात्रों के साथ धोखाधड़ी हो रही है। 2,110 छात्रों को वजीफा नहीं दिया जा रहा है। 4,288 छात्रों ने कम वजीफा देने की बात कही तो 1,228 छात्रों ने कहा, वजीफे का भुगतान तो होता है लेकिन कुछ दिन बाद कॉलेज को वापस भी करना पड़ता है।
क्या कहता है नियम
नियम एक समान लेकिन वेतन अलग
केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार, देश में 358 सरकारी और 296 निजी मेडिकल कॉलेज हैं। इनके अलावा 157 कॉलेज केंद्र की प्रायोजित योजना के तहत स्वीकृत हैं। इन कॉलेजों में एमबीबीएस की एक लाख और पीजी छात्रों की करीब 68 हजार सीटें हैं। मेडिकल कॉलेजों के लिए नियम पूरे देश में एक समान हैं लेकिन चिकित्सा छात्रों का वेतन अलग अलग है। उदाहरण के तौर पर तमिलनाडु में इन छात्रों को 35,000 रुपये प्रति माह से लेकर 102838 रुपये (ईएसआईसी संस्थान) तक मासिक मिलता है। उत्तर प्रदेश में एमडी माइक्रोबायोलॉजी की पढ़ाई करने वाले पीजी छात्र को प्रति माह 15,600- 39100 रुपये से लेकर 109955 रुपये तक मासिक दिए जा रहे हैं।
छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और गुजरात में वजीफा एकसमान