आदिवासी समुदाय के छात्रों को उनके पारंपरिक ज्ञान में विशेष स्किल ट्रेनिंग दी जाएगी, जिससे शिक्षा समाप्त करने के बाद वे अपने लिए एक बेहतर रोजगार हासिल कर सकें। इस कौशल में उनके पारंपरिक ज्ञान को नई तकनीकी के साथ जोड़कर आधुनिक बनाया जाएगा, जिससे बदलते समय के अनुसार बाजार में उनकी प्रासंगिकता बनी रहे। नई शिक्षा नीति में छात्रों को यह विशेष सुविधा दी जाएगी कि वे बीच में छूटी अधूरी शिक्षा को किसी भी समय पूरा कर सकेंगे। अधूरी शिक्षा पूरा करने के चरण में उन्हें पहले पूरा किए जा चुके शिक्षा के हिस्से को दोबारा पढ़ने की आवश्यकता नहीं होगी।
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग इस क्षेत्र में काम कर रहे सर्वोच्च संस्थानों-विशेषज्ञों से विचार-विमर्श कर यह समझने का प्रयास कर रहा है कि इन क्षेत्रों में चलाए गए अब तक के शिक्षा कार्यक्रम कितने सफल रहे और इन्हें ज्यादा सफल बनाने के लिए और क्या किया जाना चाहिए। कुछ विशेषज्ञों की राय रही है कि जनजातीय समूहों को दी जा रही शिक्षा और ट्रेनिंग उनके मूल रहन-सहन और परंपरा से मेल नहीं खाती है जिससे छात्र उनके साथ स्वयं को जोड़ नहीं पाते और शिक्षा को अधूरी छोड़ देते हैं।
लेकिन नई शिक्षा नीति में आदिवासी समूहों और जनजातीय समुदाय के छात्रों को उनकी भाषा में उनके पारंपरिक ज्ञान को उपलब्ध कराया जाएगा, जिससे वे स्वयं को इससे जोड़ सकें और अपनी शिक्षा पूर्ण कर सकें। उन्हें उनके पारंपरिक ज्ञान में मिली वोकेशनल ट्रेनिंग उन्हें रोजगार उपलब्ध कराने या आत्मनिर्भऱ होने में मदद करेगी।
राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के अध्यक्ष हर्ष चौहान ने एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि आदिवासी-जनजाति समुदाय के पास बेहद उन्नत किस्म का पारंपरिक ज्ञान होता है। यह पर्यावरण के अनुकूल और समुदाय की स्वावलंबी आत्मनिर्भरता के विचार पर आधारित होता है। लेकिन बदलते समय के अनुसार यदि इसमें आधुनिकता को जोड़ दिया जाए तो जनजातीय समुदायों के युवाओं के लिए यह वरदान साबित हो सकता है। साथ ही इससे समाज की पर्यावरणीय चिंताओं को भी कम करने में सहायता मिलेगी।