जस्टिस मुकेश रसिक भाई शाह पटना हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस बने हैं। इस रविवार 12 अगस्त को बिहार के राज्यपाल सत्यपाल मलिक ने राजभवन में उन्हें शपथ दिलाई।
जस्टिस शाह इससे पहले गुजरात हाई कोर्ट में जज थे। साल 1982 में गुजरात हाई कोर्ट में उन्होंने वकालत की शुरुआत की थी। साल 2004 में वो वहां के जज बने और एक साल बाद वो स्थाई जज बने।
पटना के स्थानीय पत्रकार नीरज प्रियदर्शी ने जस्टिस शाह से उनकी प्राथमिकताओं और उनके जुडिशल करियर के बारे में लंबी बात की।
सवालः 1982 से गुजरात हाई कोर्ट में आपने वकालत शुरू की। बाद में एडिशनल जज बने। फिर जज बने, और अब चीफ जस्टिस। एक वकील के चीफ जस्टिस बनने तक का संघर्ष कैसा होता है?
जवाबः नथिंग इज इम्पॉसिबल। मैंने हर फील्ड में काम किया है। क्रिमिनल लॉयर रहा हूं। दीवानी मुकदमे भी लड़े हैं। उसका उदाहरण है। पॉक्सो के एक मामले में मेरे जजमेंट में की गई टिप्पणी बाद में देश का कानून बन गई।
सवालः क्या था उस टिप्पणी में?
जवाबः उसमें क्या था कि, आप लोग जानते हो कि पॉक्सो का कानून कितना स्ट्रिक्ट हो गया है। जो दुष्कर्म जैसा अपराध करते हैं उनमें भय तो होना ही चाहिए इसलिए बदलने का कोई सवाल ही नहीं है। पर कभी-कभी क्या होता है कि ये जो 17, 18 वाले लड़के होते हैं...
सवाल: जिनको जुवेनाइल बोलते हैं!
जवाबः हां, उन लोगों को पता नहीं होता कि ये कन्सेंट से करेंगे तो भी ये एक अपराध है। तो बेचारे को क्या होता है कि 10-15 साल की सजा हो जाती है, कम से कम 10 साल की। इस तरह उनका 10 साल चला जाता है। मैंने जजमेंट में आखिर में लिखा था कि ऐसे मामलों को ध्यान में रखते हुए जागरुकता फैलाने की ज़रूरत है। तो ये जो यंगस्टर्स हैं, पहले वो ये जान लें कि सहमति के बावजूद भी वे 10 साल के लिए जेल जा सकते हैं। आप समझ सकते हो कि 10 साल तक कोई लड़का जेल में रहेगा तो कैसा बनकर बाहर निकलेगा।
दूसरा जजमेंट जो मैंने दिया था वो फॉरेस्ट डिपार्टमेंट का केस था। 546 लोग न्याय का इंतज़ार कर रहे थे। काफी केस चला था। मैंने डिपार्टमेंट के लोगों को बुलाया और बोला कि ये लोग तैयार हैं लम्पसम कॉम्पेन्सेशन देने के लिए। कोई नहीं जानता कि कौन जीतेगा, कौन हारेगा। सरकार तो कभी-कभी कहती है कि सुप्रीम कोर्ट तक जाएंगे। मैंने बोला ये तो बगल का काम है। सभी 546 लोग वहीं थे। तो मैंने लास्ट डे सेटलमेंट करवाया।
सभी खुश थे क्योंकि मुआवजे के तौर पर उन्हें सात करोड़ रुपए मिले थे। गुजरातियों के लिए ये मेरा आखिरी प्रयास था। इस तरह मैंने हमेशा संतुलन रखने की कोशिश की।