सर्जरी के दौरान अधिक मात्रा में एनेस्थिसिया की खुराक देने से एक बुजुर्ग की मौत हो गई थी। बुजुर्ग के मौत के 15 साल शहर के एक अस्पताल और डॉक्टर को वरिष्ठ नागरिक के परिवार को मुआवजे के तौर पर 12 लाख रुपये से अधिक का भुगतान करने का आदेश दिया गया है। यह फैसला राज्य आयोग ने दिया था, जिसे राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग (एनसीडीआरसी) ने बरकरार रखा है। एनडीआरसी ने 29 मार्च को पीड़ित परिवार के पक्ष में महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग द्वारा 2015 में पारित आदेश को चुनौती देते हुए डॉक्टर और अस्पताल द्वारा दायर अपील को खारिज कर दिया था।
एनसीडीआरसी ने माना कि इस लापरवाही के लिए एनेस्थेसियोलॉजिस्ट जिम्मेदार थी। मृतक महिला की बेटी द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत बताया गया कि कुसुम (66) का 21 जून 2008 को परेल स्थित अस्पताल में हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. अजय राठौर द्वारा हाथ में फ्रैक्चर के लिए ऑपरेशन किया गया था। उस दौरान एनेस्थेसियोलॉजिस्ट डॉ मूलजी खेमजी गाड़ा थे। सुबह कुसुम का ऑपरेशन किया गया, लेकिन ज्यादा एनेस्थीसिया देने के कारण मरीज को होश नहीं आया। उसकी हालत और खराब हो गई, जिस वजह से उसे वेंटिलेटर पर रखा गया था। मरीज को बेहोशी की ही हालत में काफी देर तक अस्पताल में भर्ती रखा गया था। न्यूरोलॉजिस्ट ने सीटी स्कैन और एमआरआई करने के बाद उसे 'हाइपोक्सिक एन्सेफैलोपैथी' से रोग की पहचान की। इसके बाद ही बेहोश मरीज को दूसरे अस्पताल में स्थानांतरित कर दिया गया, जहां 24 अक्टूबर, 2008 को उसकी मौत हो गई।
मृतक की बेटी ने पहले जिला मंच, मध्य मुंबई के समक्ष एक शिकायत दर्ज की गई, जहां उसकी याचिका को खारिज कर दिया। इसके बाद बेटी ने 2015 में राज्य उपभोक्ता आयोग का रुख किया। 2018 में मरीज के पक्ष में फैसला सुनाया और अस्पताल और डॉक्टर को मरीज के परिवार को 12 लाख रुपये से अधिक का मुआवजा देने का आदेश दिया।
2019 में डॉक्टर और अस्पताल ने किसी भी तरह की लापरवाही से इनकार करते हुए राष्ट्रीय उपभोक्ता आयोग के समक्ष अपील दायर की। यहां एनडीआरसी ने माना कि एनेस्थेसियोलॉजिस्ट ने प्री-एनेस्थेटिक परीक्षण ठीक से नहीं किया था। उन्होंने कहा- "मेरे विचार में, यह एनेस्थेसियोलॉजिस्ट की लापरवाही और विफलता थी, जिसने केटामाइन की अत्यधिक खुराक दी और हाइपोक्सिक घटना का प्रबंधन करने में विफल रही।"