मुकुल द्विवेदी का प्लान बगैर खून-खराबा के बाग को खाली कराने का था।
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मथुरा के जवाहर बाग के खूनी संग्राम में जीवित बचे कब्जाधारी जब भी दो जून की शाम के उस खौफनाक मंजर को याद करेंगे तो उन्हें शहीद मुकुल द्विवेदी फरिश्ते की तरह नजर आएंगे।
अगर मुकुल ने बाग की सात फुट ऊंची दीवार तुड़वाकर रास्ता न बनवाया होता तो शायद और भी कई कब्जाधारियों की जान चली जाती। इसके सिवाय बचकर भागने का कोई रास्ता जो नहीं था। इस दीवार के गिरते ही क्रूर कब्जाधारियों ने उन्हें बेदर्दी से मार डाला था। इसके बाद उनके कातिल भी इसी रास्ते से भागे। पुलिस अब उनकी रात-दिन तलाश कर रही है।
सीनियर फोरेंसिक साइंटिस्ट गीता रानी के नेतृत्व में आगरा की फील्ड यूनिट जवाहरबाग के क्राइम सीन का अध्ययन कर लौटी है। अब इसकी रिपोर्ट तैयार की जा रही है। फील्ड यूनिट से जुड़े सूत्रों ने बताया कि खूनी संग्राम दीवार टूटते ही शुरू हो गया। उधर, पुलिस सूत्रों का कहना है कि एसपी सिटी मुकुल द्विवेदी का प्लान बगैर खून-खराबा के बाग को खाली कराने का था।
वे दीवार तुड़वाकर कब्जाधारियों के लिए भागने का रास्ता बनवा रहे थे। कब्जाधारियों को लगा कि ढाई साल से चला आ रहा उनका कब्जा हट जाएगा। इसी आशंका में उन्होंने हमला बोल दिया। मुकुल को सिर कुचलकर मारा गया था। इसके बाद पुलिस हरकत में आई तो कब्जाधारी भागे। मेन गेट पर पुलिस थी। यहां आग भी लगी थी। इसके अलावा पूरे बाग की चारदीवारी है। एक ओर पुलिसवालों के आवास हैं। दूसरी तरफ आर्मी के क्वार्टर। तीसरी तरफ पुलिस लाइन। मेन गेट पर ही एसपी सिटी का ऑफिस था।
रामवृक्ष यादव ने जगह-जगह आग लगा दी थी। कब्जाधारियों के पास बचकर भागने का सिर्फ एक ही रास्ता बचा। यह वही था जो मुकुल द्विवेदी ने तैयार कराया था। इसी से होकर उनके कातिल भागे। फील्ड यूनिट को कब्जाधारियों की तमाम चप्पल-जूते इसी रास्ते पर पड़े मिले, जो भागते समय छूट गए थे।