राज्यसभा में शुक्रवार को सांसदों ने न्यायपालिका में भी आरक्षण की व्यवस्था करने को लेकर आवाज बुलंद की। इसके लिए संविधान में संशोधन करने के साथ ही मांग की गई कि एक सर्वदलीय बैठक बुलाई जाए, उसमें इस मुद्दे को रखा जाए।
सरकार ने भी बताया कि वर्तमान में आरक्षण का कोई ऐसा प्रस्ताव मौजूद नहीं है। न्यायपालिका की सेवाओं में ओबीसी, एससी, एसटी, मुस्लिम व महिलाओं को आरक्षण मिलता है या नहीं, इस प्रश्न का जवाब कानून मंत्री सदानंद गौड़ा ने दिया। उन्होंने बताया कि सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट में फिलहाल जजों की जो भर्ती होती है, वह संविधान के अनुच्छेद 124 और 217 के तहत की जाती है। इसमें किसी भी तरह के कोटा को लेकर कोई प्रावधान नहीं किया गया है।
उन्होंने बताया कि हालांकि हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश से जजों का नाम भेजते समय इन वर्गों को भी संज्ञान में लेने की अपील जरूर की गई है। इससे पहले कांग्रेस, भाकपा और बसपा समेत कई पार्टियों के सदस्यों ने न्यायपालिका में आरक्षण का समर्थन किया।
सांसदों ने इस मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाने की मांग की। सवालों का जवाब देते हुए गौड़ा ने कहा कि अनुच्छेद 235 के तहत जिला और निचली अदालतों के सदस्यों के प्रशासनिक अधिकार राज्यों के संबंधित हाई कोर्ट के अधीन आते हैं।