यूपी विधानसभा चुनाव के लिए उम्मीदवारों की भरमार देख भाजपा आलाकमान के हौसले बुलंद हैं। प्रदेश की अलग-अलग सीटों से करीब 8000 से ज्यादा मजबूत नेताओं ने उम्मीदवार बनने की प्रबल इच्छा जताई है। यूपी की चुनाव रणनीति के सूत्रधार संगठन के एक नेता ने बताया कि अकेले उनके पास पूरे प्रदेश से करीब 8000 से ज्यादा उम्मीदवारों के बॉयोडाटा आए हैं। जबकि अन्य नेताओं की संख्या जोड़े तो संख्या कहीं इससे भी पार जाएगी। मगर 8000 उम्मीदवार बेहद गंभीर हैं।
उक्त नेता के अनुसार हर सीट पर अमूमन 20 के करीब प्रमुख दावेदार है। आलम यह है कि जो सीट भाजपा की सबसे कमजोर मानी जाती हैं, वहां भी करीब आधा दर्जन से ज्यादा उम्मीदवारों ने टिकट का दावा ठोका है। इस संकेत को पार्टी आलाकमान सूबे की सियासी हवा को जमीन पर अपने पक्ष में मान रही है। हालांकि उम्मीदवारों की भरमार ने प्रत्याशी चयन के मामले में भाजपा आलाकमान की मुश्किलें थोड़ी बढ़ा दी हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के यहां उम्मीदवार चयन की कवायद कर रहे शीर्ष नेताओं को अधिक योग्य प्रत्याशियों के वजह से चयन में मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है।
बावजूद उसके भाजपा आलाकमान जीत को लेकर पूरी तरह आशान्वित है। भाजपा के जीत के 5 सूत्रों को अमर उजाला से साझा करते हुए संगठन के वरिष्ठ नेता ने बताया कि पीएम मोदी की छवि के अलावा ऐसे कार्य हुए हैं। जिससे की भाजपा यूपी के चुनावी केंद्र में पहुंची है। पिछले 15 साल की स्थितियों के मामले में भाजपा की स्थिति इस चुनाव में उल्ट है।
भाजपा की जीत के पांच सूत्र
बीजेपी
सपा-बसपा दोनों ही दल यह करार दे रहे हैं कि उनकी लड़ाई भाजपा के साथ हैं। यह बात ही भाजपा को यूपी चुनाव के केंद्र में लाकर खड़ा करती है। इसके लिए पार्टी ने बीते 2 साल से प्रयास किया है। सामाजिक समीकरण, संगठन की मजबूती, ग्रामीण जुड़ाव, युवा और महिलाओं का जुड़ाव सरीखे 5 मोर्चों पर जबरदस्त पहल हुई है जिसके वजह से पार्टी आज जीत की स्थिति में है।
भाजपा की जीत के पांच सूत्र
सामाजिक समीकरण: सामाजिक समीकरण को अपने पक्ष में होने का दावा करते हुए भाजपा नेता का कहना है कि हम 80 प्रतिशत (गैर जाटव दलित, गैर यादव पिछड़ा वर्ग और अगड़ा तबका)की राजनीति कर रहे हैं जबकि सपा (यादव-मुस्लिम) और बसपा (जाटव, मुस्लिम) 20 प्रतिशत वर्ग के बीच फंसी हुई है।
पिछड़ा वर्ग तो दूर ठाकुर और ब्राहण तक ने भाजपा का साथ छोड़ दिया था। 2014 में यह वर्ग मोदी लहर में भाजपा के साथ जुड़ा उसे आज तक जोड़े रखने में कामयाब रहे हैं। गैर जाटव दलित और गैर यादव ओबीसी आज पूरी तरह से भाजपा के साथ है। भाजपा ने संगठन से लेकर जनता का चेहरा बनाने तक में सामाजिक समीकरण का ध्यान रखा है। यूपी में भाजपा के 17 सांसद दलित हैं जिसमें गैर जाटवों की संख्या अधिक है। बीते दिनों 200 से ज्यादा पिछड़ा वर्ग सम्मेलन हुए हैं।
मजबूत संगठन: भाजपा को सबसे ज्यादा भरोसा अपने मजबूत संगठन पर है। यादव और मुस्लिम बाहूल्य इलाकों को छोड़ सूबे की 1 लाख 47 हजार बूथों में से 1 लाख 28 हजार पर भाजपा के सक्रिय कार्यकर्ता। केंद्रीय कक्ष के जरिए बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं से लगातार अपडेट लिए जा रहे हैं। कहीं कमजोर कड़ी दिखने पर बदल किया जाता है।
भाजपा को सबसे ज्यादा भरोसा अपने मजबूत संगठन पर है
अब गांव की हुई भाजपा : यूपी के संगठन ने पिछले 2 वर्षों में भाजपा को शहरी पार्टी की छाप से निकालकर गांव की पार्टी के रूप में बदला है। इसके चलते पार्टी को गांवों से अपार सफलता की उम्मीद है। ग्राम पंचायत के चुनाव लडने के फैसले ने निचले स्तर पर संगठन को मजबूती दी।
एक नहीं 300 चेहरे: मुख्यमंत्री पद का चेहरा सामने न होने की काट में भाजपा रणनीतिकारों का कहना है कि उनके पास 1 नहीं 300 चेहरे हैं। हर वर्ग और जाति से बीते दो साल में करीब 300 से ज्यादा चेहरों को दूसरी पांत के नेता के रूप में अलग-अलग माध्यमों से बढ़ाया गया है। वे अपने क्षेत्रों में मुख्यमंत्री चेहरे से कम नहीं।
युवा और महिलाओं का पार्टी से जुड़ाव: पीएम मोदी की लोकप्रियता से प्रभावित युवा और महिला वर्ग को सीधा भाजपा से जोड़ा गया है। इसके लिए अलग से जिलावार युवा और महिला सम्मेलन किए गए। इस वर्ग में भाजपा के प्रभाव का अंदाजा इसी से लगता है कि चंद दिनों पहले एक साथ 368 जगहों पर हुए स्मृति ईरानी के उड़ान कार्यक्रम में 1 लाख 75 हजार महिलाओं ने भागीदारी दिखाई।