घाटी में समाज शास्त्र के प्रोफेसर मोहम्मद रफी भट का आतंकवाद से हाथ मिलाना और सैन्य कार्रवाई में खूंखार आतंकवादियों के साथ उसका मारा जाना केंद्र की आक्रामक कश्मीर नीति का लिटमस टेस्ट माना जा रहा है।
घाटी में दिनों दिन बिगड़ते हालात के मद्देनजर सरकार और सुरक्षा तंत्र का शीर्ष नेतृत्व कश्मीर की मौजूदा नीति पर पुनर्विचार पर गहन मंथन कर रहा है।
शीर्ष सरकारी सूत्रों के मुताबिक अगर सैन्य कार्रवाई में कुछ दिनों की ढील देने के विकल्प पर अमल किया जाए तो नियंत्रण रेखा (एलओसी) के पार इंतजार में बैठे सैकड़ो पाक प्रशीक्षित आतंकवादी घाटी में अपनी पैठ मजबूत कर लेंगे। यह स्थिति स्थानीय आतंकवादियों के मुकाबले कई गुणा ज्यादा खतरनाक होगी।
सेना के उत्तरी कमान के पूर्व प्रमुख और कश्मीर में लंबी कार्रवाई कर चुके लेफ्टिनेंट जनरल दीपेन्द्र हुडा ने माना कि कश्मीर में सिर्फ सैन्य कार्रवाई से हालात नहीं सुधरेंगे।
हुडा के मुताबिक सघन कार्रवाई के साथ युवाओं को मुख्यधारा में जोड़ने में सरकार कमजोर पड़ गई है। यही वजह है कि सिर्फ युवक ही नहीं कॉलेज के छात्र- छात्राएं और महिलाएं भी सड़क पर उतरने लगे हैं।
विश्वविद्याल के प्रोफेसर का आतंकवाद की तरफ मुड़ना वाकई एक खतरनाक संकेत है। लेफ्टिनेंट जनरल हुडा ने बताया कि कश्मीर की आवाम को सरकार की तरफ से सिर्फ बंदूक की कार्रवाई का संदेश मिल रहा है। ऐसा नहीं कि सेना और सुरक्षा बल की चलने वाले सदभावना कार्यक्रम, कश्मीरी युवाओं का देश भ्रमण और व्यवसायिक प्रशिक्षण जैसी योजनाएं खत्म कर दी गई हैं।
लेकिन केंद्र और राज्य सरकार अपने सकारात्मक संदेशों में कमजोर दिख रही है। इस सूरत में वहां के युवक अलगाववादियों और आतंकवादियों की तरफ देख रहे हैं। हुडा के मुताबिक कश्मीर पॉलिसी पर पुनर्विचार की जरुरत है।
सुरक्षा तंत्र के कश्मीर से जुड़े अधिकारी ने बताया कि फिलहाल दो कदम आगे-एक कदम पीछे की नीति के तहत कुछ ठोस फैसले लिए जा सकते हैं। अधिकारी के मुताबिक कश्मीर में सरकार दो तरफा घिर गई है। अगर वह स्थानीय आतंकियों पर दबिश जारी रखती है तो आम लोग सड़क पर उतरते हैं और नए आतंकी पैदा होते हैं। अगर ढील देती है तो पाकिस्तानी आतंकियों की पैठ बढ़ती है। गर्मी होने की वजह से एलओसी पर बर्फ नहीं है और उनका कश्मीर में घुसपैठ करना फिलहाल बहुत आसान है।