प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गुजरात के दिनों से ही उनके सिपहसालार रहे पार्टी अध्यक्ष अमित शाह ने काम बाँट लिया है। इलाहाबाद में पिछले हफ्ते हुई भारतीय जनता पार्टी राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक से ये संदेश उभरा है कि मोदी विकास और समाज में समरसता की बात करेंगे और शाह हिंदुत्व के आधार पर वोटरों का ध्रुवीकरण करने की कोशिश करेंगे। एक चेहरा उदार और दूसरा उग्र।
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एक विकास का मसीहा और दूसरा हिंदुओं का प्रखर रक्षक। एक सबको साथ लेकर चलने वाला अटल बिहारी वाजयेपी तो दूसरा उग्र हिंदू नेता लालकृष्ण आडवाणी। अब उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव जीतने के लिए भारतीय जनता पार्टी इसी फॉर्मूले को आजमाना चाहती है और इसका ऐलान इलाहाबाद में कर दिया गया है।
वैसे मोदी और शाह ने जिस तरह इलाहाबाद में अलग-अलग तरह की छवियाँ पेश कीं उसकी बानगी हिंदुस्तान की राजनीति में पहले भी मिली है। पढ़ें- सदभावना के सुर बिगाड़ने के अभियुक्त संगीत सोम नब्बे के दशक की शुरुआत से ही लालकृष्ण आडवाणी हिंदुत्व के उग्र प्रतिनिधि के तौर पर उभारे गए और अटल बिहारी वाजपेयी को उदारमना राजनेता के तौर पर सामने लाया गया। कई बार दोनों के बीच द्वंद्व की खबरें भी अखबारों में छपा करती थीं।
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हिंदुत्ववाद संघ परिवार का एक कारगर औजार
बीजेपी वर्कर
यह द्वंद्वात्मक हिंदुत्ववाद संघ परिवार का एक कारगर औजार है जिसे उसके नेता कई बार इस्तेमाल करते हैं। यही वजह है कि गुजरात में मुस्लिम विरोधी दंगों के बाद जहाँ नरेंद्र मोदी प्रचंड हिंदू हृदय सम्राट की तरह उभरे वहीं अटल बिहारी वाजयेपी ने उन्हें राजधर्म निभाने की बात सार्वजनिक मंच से कही।
संयंम या क्रोध? इलाहाबाद में हजारों लोगों की रैली में नरेंद्र मोदी ने जिन सात ‘स’ का मूलमंत्र दिया उसमें संयम भी एक सूत्र था। मोदी ने कहा कि पार्टी कार्यकर्ताओं को सेवाभाव, संतुलन, समन्वय, संयम, सकारात्मक, संवेदना और संवाद से काम लेना चाहिए। पर अमित शाह के भाषण में संयम, संवेदना और संतुलन का सुर सिरे से गायब था।
उसमें उग्र तेवर ज्यादा थे। उन्होंने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कैराना गाँव से हिंदुओं के कथित पलायन के मुद्दे पर बात की और कहा, “कैराना के अंदर जो पलायन हुआ है उसे उत्तर प्रदेश की जनता को हलके में नहीं लेना चाहिए।” फिर उन्होंने रैली में मौजूद हजारों लोगों से अपने ही अंदाज में सवाल किया कि क्या आप चाहते हैं कि उत्तर प्रदेश से ऐसा ही पलायन हो? अगर नहीं चाहते तो समाजवादी पार्टी की सरकार को सत्ता से उखाड़ फेंकिए।
कैराना पश्चिमी उत्तर प्रदेश का एक ऊँघता हुआ सा कस्बा है जो पिछले कुछ हफ्तों से बार बार खबरों में आ रहा है। अचानक भारतीय जनता पार्टी के कई नेता कैराना की तुलना कश्मीर से कर रहे हैं और कह रहे हैं कि जिस तरह से कश्मीर से हिंदुओं को निकाला गया वैसा कैराना में नहीं होने देंगे।
पलायन- कैराना एक, कहानियां अनेक पर सवाल पूछा जा रहा है कि जिस कैराना को भारतीय जनता पार्टी एक चुनावी मुद्दे के तौर पर उछाल रही है, आखिर वहाँ हुआ क्या है? क्या कैराना के हिंदू वाकई दहशत में जी रहे हैं या वो डर कर भागने पर मजबूर हुए हैं?
कैराना का सच वो सच नहीं है जो बीजेपी के नेता दिखाना चाहते हैं
कैराना पलायन पर कार्टून
कुछ टीवी चैनलों और अखबारों के रिपोर्टरों ने कैराना जाकर सच जानने की कोशिश की तो पता चला कि हुकुम सिंह के दावे में बहुत दम नहीं है। ऐसी खबरें सामने आने पर हुकम सिंह ने अपने तेवर बदल दिए। रिपोर्टों के मुताबिक अब वो कह रहे हैं कि कैराना का मामला हिंदू-मुस्लिम का मामला है ही नहीं।
एनडीटीवी को दिए एक इंटरव्यू में हुकुम सिंह ने कहा, “गलती से किसी ने सूची में हिंदू परिवार लिख दिया। मैंने इसे (गलती को) ठीक करने को कहा है।" दरअसल, पिछले संसदीय चुनाव से पहले मुजफ्फरनगर में हुए दंगों के बाद पश्चिमी उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पूरे प्रदेश और कई दूसरे प्रदेशों में भी सांप्रदायिक ध्रुवीकरण हुआ जिसका फायदा बीजेपी को हुआ। अब एक बार फिर से पार्टी को यूपी विधानसभा चुनाव से पहले एक ऐसे मुद्दे की तलाश है जिससे हिंदू वोटरों को एकजुट करने में मदद मिले। इसलिए भले ही फिलहाल बीजेपी के कैराना मुद्दे की हवा निकल गई हो और कई जरियों से ये खबर सामने आ गई हो कि कैराना का सच वो सच नहीं है जो बीजेपी के नेता दिखाना चाहते हैं, लेकिन इससे कैराना फॉर्मूले की एक्सपायरी डेट खत्म नहीं हुई है।
बीजेपी कैराना के जरिए पूरे उत्तर प्रदेश के दूर दराज इलाकों में रहने वाले हिंदू वोटरों को संदेश देना चाहती है कि कश्मीर तो कश्मीर, हिंदुओं को उत्तर प्रदेश में भी चैन से नहीं रहने दिया जाता। अब अगर कोई ये सवाल करे कि हिंदुओं को पलायन करने पर कौन मजबूर कर रहा है तो अलग-अलग समय पर बीजेपी नेता कभी एक वर्ग विशेष को जिम्मेदार ठहराते हैं, कभी एक वर्ग विशेष के अपराधी तत्वों को, तो कभी सीधे सीधे मुसलमानों को इसका जिम्मेदार ठहराया जाता है।
जी टीवी की खबरों पर आँख मूँद कर भरोसा करने वालों के लिए इससे ज्यादा अविश्वसनीय कुछ नहीं हो सकता कि हिंदुओं को अपने ही देश में चैन से न रहने दिया जाए। ऐसे माहौल में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह का उग्र आह्वान सामने आता है - "क्या आप उत्तर प्रदेश में ऐसा पलायन चाहते हैं? अगर नहीं तो समाजवादी पार्टी की सरकार को उखाड़ फेंको।" जब तक नरेंद्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो वो भी कई बार वही बोली बोलते थे जो आज अमित शाह बोल रहे हैं।
चुनाव प्रचार के दौरान वो चुनाव आयोग के प्रमुख जेएम लिंगदोह को उनकी ईसाई धार्मिक पहचान वाले पूरे नाम जेम्स माइकल लिंगदोह से बुलाते थे और अहमद पटेल को अहमद मियाँ पटेल ही कहते थे। उन्होंने ही ये तंज किया था - हम दो हमारे पाँच कहते हैं और फिर सड़क किनारे बैठकर साइकिल का पंचर जोड़ते हैं। ये बताने की जरूरत नहीं कि निशाने पर कौन समुदाय था।
लेकिन प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जानते हैं कि वो अब गुजरात के मुख्यमंत्री नहीं हैं और अब वो अपनी एक कड़क, फैसलाकुन नेता की छवि के साथ-साथ उदार, सबको साथ लेकर चलने वाले युगदृष्टा की छवि भी गढ़ रहे हैं। वो नहीं चाहते कि उनके किसी बयान से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का आरोप सीधा उन पर लगे।
वो विकास पुरुष की छवि को बनाए रखना चाहते हैं पर उन्हें मालूम है कि सिर्फ विकास का वादा उनकी पार्टी को उत्तर प्रदेश में सत्ता तक नहीं पहुँचा सकता। इसके लिए उन्हें एक कारगर फॉर्मूला चाहिए। पार्टी को आशा है कि कैराना और दादरी में ये फॉर्मूला मिल सकता है। इसलिए अचरज नहीं होना चाहिए अगर एक कैराना के गुब्बारे की हवा निकले तो प्रदेश के किसी दूसरे कोने में कोई और कैराना पैदा हो जाए जहाँ सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण आसान हो और आँच सीधे मोदी पर भी न आए।
पश्चिमी उत्तर प्रदेश पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की नजर आज से नहीं बल्कि आजादी के बाद से ही रही है। साठ के दशक में तत्कालीन सरसंघ चालक माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ने पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुसलमानों पर हथियारों का जखीरा इकट्ठा करने और भारत के खिलाफ षडयंत्र करने का आरोप लगाया था।
गोलवलकर तब मुसलमानों की जिस साज़िश की बात करते थे वो तो अब तक साकार नही हो पाई है, ये बात जरूर है कि जो संघ परिवार पचास और साठ के दशक में भारतीय राजनीति की परिधि में पनाह माँगता था, आज उसकी धुरी बन चुका है।
(Publish by Abhishek)