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एक्सप्लेनर: कर्नाटक में क्यों हारी कांग्रेस? यूपी में बढ़त के बाद भी खुश नहीं भाजपा, बिहार ने किया सबको बेचैन

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: कीर्तिवर्धन मिश्र Updated Thu, 29 Oct 2026 08:25 AM IST

सार

एमएलसी चुनाव में कर्नाटक जैसे राज्य में कांग्रेस का खाता न खुलना, बैलेट पेपर से वोटिंग के बावजूद विपक्ष का नुकसान और जनसुराज पार्टी की तीन महीने के अंदर दूसरी जीत के क्या मायने हैं? जानिए यूपी, बिहार और कर्नाटक के नतीजों का पूरा राजनीतिक विश्लेषण।
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एमएलसी चुनाव के नतीजों का विश्लेषण। - फोटो : अमर उजाला
चार राज्यों में विधान परिषद की 28 सीटों के लिए हुए चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। अगर समग्र तौर पर इन नतीजों को देखा जाए तो सामने आता है कि एनडीए गठबंधन इस बार फायदे में रहा है। इसके बाद भी उसके लिए कुछ गंभीर सवाल हैं। वहीं, विपक्षी गठबंधन को यूं तो सीटों का घाटा नहीं हुआ है, पर नतीजे उसके लिए भी चेतावनी की तरह देखे जा रहे हैं। 

अमर उजाला ने एमएलसी चुनाव के परिणामों को लेकर तीन विश्लेषकों से बात की। इनमें वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक राकेश शुक्ल और पूर्णिमा त्रिपाठी शामिल रहीं। दोनों ही जानकारों ने कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र को लेकर अहम विश्लेषण साझा किया। आइये जानते हैं एमएलसी चुनाव को लेकर सियासी विशेषज्ञों ने क्या कहा...
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एमएलसी चुनाव के नतीजों का विश्लेषण। - फोटो : अमर उजाला
चार राज्यों में विधान परिषद की 28 सीटों के लिए हुए चुनाव के नतीजे आ चुके हैं। अगर समग्र तौर पर इन नतीजों को देखा जाए तो सामने आता है कि एनडीए गठबंधन इस बार फायदे में रहा है। इसके बाद भी उसके लिए कुछ गंभीर सवाल हैं। वहीं, विपक्षी गठबंधन को यूं तो सीटों का घाटा नहीं हुआ है, पर नतीजे उसके लिए भी चेतावनी की तरह देखे जा रहे हैं। 

अमर उजाला ने एमएलसी चुनाव के परिणामों को लेकर तीन विश्लेषकों से बात की। इनमें वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक राकेश शुक्ल और पूर्णिमा त्रिपाठी शामिल रहीं। दोनों ही जानकारों ने कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, बिहार और महाराष्ट्र को लेकर अहम विश्लेषण साझा किया। आइये जानते हैं एमएलसी चुनाव को लेकर सियासी विशेषज्ञों ने क्या कहा...

कर्नाटक में एमएलसी चुनाव नतीजों के क्या मायने?

कर्नाटक में भाजपा-जेडीएस के एनडीए गठबंधन ने सभी चार सीटों पर क्लीन स्वीप किया है। हालांकि, चार में से तीन सीटें पहले से ही भाजपा के पास थीं। उसकी सहयोगी जेडीएस ने एक सीट कांग्रेस से छीनने में सफलता पाई है। इन नतीजों से राज्य सरकार के स्थायित्व पर तो प्रभाव नहीं पड़ेगा, लेकिन यह सत्तारूढ़ कांग्रेस के लिए एक बड़ा राजनीतिक झटका माना जा रहा है। 

राकेश शुक्ल के मुताबिक, कर्नाटक में कांग्रेस की अपनी सरकार है, जहां आमतौर पर 50% समर्थन की उम्मीद रहती है, लेकिन इस चुनाव में हार से यह दिखता है कि डीके. शिवकुमार का नेतृत्व फलीभूत नहीं हो रहा है। इससे यह सवाल उठ खड़ा हुआ है कि क्या मुख्यमंत्री बदलने का फैसला सही नहीं था। राकेश शुक्ल ने आगे कहा कि इस हार ने 1 नवंबर को दिल्ली में ईवीएम और लोकतंत्र बचाने के मुद्दे पर होने वाली कांग्रेस की बड़ी रैली और देशव्यापी आंदोलन के उत्साह को बड़ा झटका दिया है।

ये भी पढ़ें: एक्सप्लेनर: चार राज्यों की 28 विधान परिषद सीटों पर क्या रहे नतीजे, यूपी से कर्नाटक तक एनडीए-विपक्ष में कौन आगे

पूर्णिमा त्रिपाठी ने कहा, कर्नाटक में कांग्रेस की सत्ता होने के बावजूद पार्टी अपनी मौजूदा सीट भी बचा नहीं पाई। ये पार्टी के लिए एक बहुत बड़ा झटका है। उन्होंने भी स्पष्ट किया कि कांग्रेस की ओर से चलाए जा रहे 'वोट चोरी', 'एसआईआर' और 'लोकतंत्र बचाओ' जैसे अभियानों के बीच अपनी ही सरकार वाले राज्य में हारना इन अभियानों के लिए बड़ा सेटबैक है।


उत्तर प्रदेश में सियासी दलों का प्रदर्शन क्या कहता है?

उत्तर प्रदेश विधान परिषद 11 सीटों पर हुए चुनाव में मुख्य मुकाबला सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच रहा। जिन 11 सीटों पर चुनाव हो रहे हैं, उनमें से छह पहले भाजपा के पास, तीन सीट सपा के पास थीं। दो सीटों पर निर्दलीयों का कब्जा था। ताजा एमएलसी चुनाव में एनडीए ने छह सीटों पर पकड़ बनाई रखी है। 

भाजपा ने पांच सीटों- मेरठ स्नातक, मेरठ शिक्षक, बरेली-मुरादाबाद शिक्षक, लखनऊ शिक्षक, आगरा स्नातक और गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक पर जीत दर्ज की। हालांकि, जहां उसने निर्दलीय के पास रही गोरखपुर-फैजाबाद शिक्षक सीट जीती, तो वहीं अपनी पुरानी लखनऊ स्नातक सीट पर पिछड़ गई।

वरिष्ठ पत्रकार राकेश शुक्ल। - फोटो : अमर उजाला
दूसरी तरफ समाजवादी पार्टी को इस एमएलसी चुनाव में दो सीटों का फायदा हुआ। पार्टी ने आगरा शिक्षक सीट निर्दलीय से छीन ली, जबकि लखनऊ स्नातक सीट पर भाजपा को पीछे कर दिया। 

1. समाजवादी पार्टी (सपा) का प्रदर्शन और बढ़त
उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी ने भाजपा से एक सीट छीनी और साथ ही पिछली बार निर्दलीय द्वारा जीती एक सीट पर भी जीत हासिल की। पूर्णिमा त्रिपाठी के अनुसार, सपा ने यूपी में अकेले ही अच्छा ग्राफ दिखाया है और इन नतीजों से यह संकेत मिलता है कि सपा को राज्य में फिलहाल कांग्रेस की बहुत ज्यादा जरूरत नहीं है।

2. काशी सीट पर भाजपा की हार का कारण
राकेश शुक्ल ने कहा कि काशी एमएलसी सीट पर भारतीय जनता पार्टी की हार की सबसे बड़ी वजह गलत प्रत्याशी का चयन रही। उन्होंने कहा कि एमएलसी चुनाव (शिक्षक व स्नातक क्षेत्र) के वोटर पढ़े-लिखे और युवा होते हैं। भाजपा ने वहां उम्रदराज प्रत्याशी उतारा, जबकि सामने युवा प्रत्याशी था, जिससे युवा और पढ़ा-लिखा वर्ग युवा उम्मीदवार की तरफ चला गया।

3. सपा-कांग्रेस गठबंधन और आगामी विधानसभा चुनावों पर असर
पूर्णिमा त्रिपाठी ने कहा कि इन नतीजों के बाद कांग्रेस यूपी में थोड़ा बैकफुट पर आ गई है। आगामी विधानसभा चुनावों की सीट-शेयरिंग बातचीत में अब कांग्रेस मजबूत स्थिति में नहीं रहेगी।

राकेश शुक्ल का मानना है कि अखिलेश यादव को ओवैसी की पार्टी- एआईएमआईएम की ओर से मुस्लिम वोटों में सेंधमारी का डर है। इसीलिए वे अभी भी कांग्रेस को साथ रखना चाहेंगे।

4. एमएलसी चुनाव की सीमित प्रकृति
दोनों विश्लेषकों का मानना है कि एमएलसी चुनाव का इलेक्टोरल कॉलेज (शिक्षक व स्नातक मतदाता) काफी सीमित और अलग होता है। इसलिए इन स्थानीय नतीजों के आधार पर सीधे उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव का बड़ा आकलन करना सही नहीं होगा, क्योंकि हर चुनाव का मिजाज अलग होता है।

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बिहार चुनाव का एनडीए-विपक्ष पर क्या असर?

बिहार विधान परिषद की 8 सीटों (4 स्नातक और 4 शिक्षक) के नतीजे काफी दिलचस्प रहे हैं। प्रशांत किशोर की पार्टी जन सुराज का खाता खुल गया है। पार्टी ने विधान परिषद में अपनी पहली चुनावी जीत दर्ज की है। वहीं, पटना शिक्षक सीट पर राजद ने भाजपा के दिग्गज नेता नवल किशोर यादव का किला ध्वस्त कर दिया।

हालांकि, पूरे नतीजों पर नजर डाली जाए तो सामने आता है कि एनडीए (भाजपा-जदयू) के पास इन आठ में से चार सीटें- पटना शिक्षक, पटना स्नातक, कोसी स्नातक और दरभंगा स्नातक पहले से थीं। अब चुनाव के नतीजे आने के बाद एनडीए के पास कुल 4 सीटें बनी हुई हैं, उसने पटना शिक्षक सीट और गंवा दी, लेकिन तिरहुत शिक्षक सीट पर जीत दर्ज की।

दूसरी तरफ कांग्रेस की दरभंगा शिक्षक सीट जरूर जन सुराज के पास चली गई, लेकिन विपक्ष की ही साथी राजद ने पटना शिक्षक सीट जीतकर भरपाई कर ली।

वरिष्ठ पत्रकार पूर्णिमा त्रिपाठी। - फोटो : अमर उजाला
1. जन सुराज/प्रशांत किशोर का उभार और बढ़ता प्रभाव
बांकीपुर में अपना पहला चुनाव जीतने वाली जनसुराज और प्रशांत किशोर को तीन महीने बाद ही एमएलसी चुनाव में भी जीत हासिल हुई है। पार्टी ने दरभंगा की स्नातक सीट जीतकर एमएलसी चुनाव में अपना खाता खोला है। जनसुराज ने पहले भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के गढ़ में जीत हासिल की और अब बिहार भाजपा अध्यक्ष संजय सरावगी के गृह जिले में भी जीत दर्ज की है।

राकेश शुक्ल के मुताबिक, प्रशांत किशोर के मुद्दे पढ़े-लिखे युवाओं और स्थानीय जनता के साथ सीधे कनेक्ट कर रहे हैं। वे बढ़ाचढ़ाकर दावे करने के बजाय 'बिहार बदलना चाहिए' और 'जीवन समृद्ध होना चाहिए' की बात करते हैं, जो वोटरों को प्रभावित कर रहा है। उन्होंने कहा कि जनसुराज का यह बढ़ता दखल बिहार की पारंपरिक स्थापित राजनीतिक पार्टियों की चिंता और रक्तचाप बढ़ा रहा है। मोकामा सीट पर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के खुद सामने आने के कारण अनंत सिंह और नीरज सिंह के बीच की प्रतिस्पर्धा में जनसुराज प्रत्याशी हार गया, लेकिन वहां भी पार्टी का प्रदर्शन गौर करने वाला रहा।

2. भाजपा के लिए बिहार में बड़ा झटका
वरिष्ठ पत्रकार राकेश शुक्ल के मुताबिक, भाजपा के लिए ये नतीजे चिंताजनक हैं, क्योंकि पार्टी अपनी तीन दशक पुरानी परंपरागत दरभंगा स्नातक एमएलसी सीट हार गई। बांकीपुर के बाद एक और प्रभाव वाले क्षेत्र में स्नातक एमएलसी सीट हारना पार्टी के लिए बड़ी चुनौती है, वह भी तब जब राज्य में भाजपा की सरकार है।

3. क्षेत्रीय दलों का प्रदर्शन ठीक-ठाक
पूर्णिमा त्रिपाठी ने कहा कि बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने भी एक सीट पर जीत हासिल की है। इसके अलावा जदयू का प्रदर्शन भी भाजपा के सहयोग से ठीक रहा है। इससे यह स्पष्ट होता है कि बिहार में मुख्य मुकाबला और पकड़ क्षेत्रीय दलों के पास ही बनी हुई है। 

4. प्रत्याशी चयन की भूमिका
उन्होंने कहा कि चुनावों में 50% भूमिका पार्टी की और 50% प्रत्याशी के चेहरे की होती है। बिहार के परिणामों में भी उम्मीदवारों की अपनी छवि और चयन का बड़ा योगदान रहा है।

क्या यूपी के विधानसभा चुनाव पर भी असर डालेंगे ये नतीजे?

राकेश शुक्ल ने कहा कि हर चुनाव का अलग मिजाज होता है। जहां पंचायत चुनाव में सिर्फ व्यक्तिगत पहुंच और व्यक्ति का चेहरा देखा जाता है तो वहीं नगर निकाय में व्यक्ति और पार्टी दोनों का प्रभाव देखा जाता है। इसी तरह विधानसभा चुनाव में 50% पार्टी और 50% प्रत्याशी का चेहरा देखा जाता है। इससे इतर लोकसभा चुनाव विशुद्ध रूप से केंद्रीय राजनीति और पार्टी का चुनाव होता है, जहां व्यक्तिगत चेहरा बहुत मायने नहीं रखता।

उन्होंने बताया कि 2022 के यूपी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस 398 में से 388 सीटों पर अपनी जमानत जब्त करवा बैठी थी और दो दर्जन से अधिक सीटों पर नोटा को कांग्रेस से अधिक वोट मिले थे। इसके बावजूद 2024 के लोकसभा चुनाव में वही कांग्रेस यूपी में 6 सीटें जीत गई। इसलिए एमएलसी चुनाव के नतीजों से सीधे आगामी विधानसभा चुनावों के परिणामों का सटीक अंदाजा नहीं लगाया जा सकता।


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