पूर्वोत्तर में असम की राजधानी गुवाहाटी से कोई सवा पांच सौ किलोमीटर दूर बसे खूबसूरत पहाड़ियों के इस प्रदेश में विधानसभा चुनावों के लिए मतदान 28 नवंबर को होने हैं। लेकिन राज्य में देश के दूसरे राज्यों की तरह कोई खास चुनावी हलचल नहीं नजर आती। चालीस सदस्यीय विधानसभा के लिए होने वाले इन चुनावों का देश में राजनीति की मुख्यधारा पर कोई असर नहीं पड़ता। लेकिन इससे इस खूबसूरत प्रदेश की सेहत पर भी कोई असर नहीं पड़ने वाला।
कभी असम के लुसाई हिल्स जिले के नाम से मशहूर यह प्रदेश अब मिजोरम के नाम से जाना जाता है। लगभग 15 साल तक केंद्र शासित प्रदेश रहने के बाद फरवरी 1987 में मिजोरम को पूर्ण राज्य का दर्जा मिला। यानी यह पूर्वोत्तर की सात बहनों में से सबसे छोटी बहन है। देश में तेलंगाना, राजस्थान, मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ के साथ इस पहाड़ी राज्य में भी चुनाव हो रहे हैं। लेकिन बाकी दिग्गज राज्यों के मुकाबले चुनावी होड़ में यह राज्य दब-सा गया है। न तो इसमें राष्ट्रीय मीडिया की कोई दिलचस्पी है और न ही कथित राष्ट्रीय नेताओं की।
वैसे, अबकी भाजपा और उसकी सहयोगी मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) राज्य की सत्ता से कांग्रेस को हटाने के लिए कमर कस कर मैदान में हैं। लेकिन संभवतः भाजपा की हिंदुत्ववादी पहचान के चलते दोनों पार्टियां यहां अलग-अलग चुनाव लड़ रही हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने बीते महीने यहां पार्टी के प्रचार अभियान की शुरुआत की थी।
मिजोरम का शाब्दिक अर्थ है मिजो लोगों का घर। राज्य की आबादी का ज्यादातर हिस्सा ईसाई है। साक्षरता में यह राज्य पूरे देश में केरल के बाद दूसरे नंबर पर है। संस्कृति, साहित्य और लोकनृत्यों के मामले में यह राज्य काफी धनी है। कई पुरानी परंपराएं और कानून अब भी लागू हैं। बाहरी लोगों को राज्य में आने के लिए इनर लाइन परमिट लेना पड़ता है। हां, सरकारी कर्मचारियों को इससे छूट है। पहले यहां लंबे अरसे तक शराबबंदी थी। लेकिन तीन साल पहले सत्तारुढ़ कांग्रेस ने शराबबंदी खत्म कर दी थी। अबकी चुनावों में शराबबंदी भी एक प्रमुख मुद्दा है।