पूर्वोत्तर राज्य मिजोरम में 28 नवंबर को होने वाले विधानसभा चुनावों में जीत कर सत्ता की हैट्रिक लगाने का सपना देख रही कांग्रेस की डगर इस बार मुश्किल नजर आ रही है। पहले तो विधानसभा अध्यक्ष हाइफेई समेत पांच विधायकों ने पार्टी से नाता तोड़ कर विपक्ष का दामन थाम लिया। उसके बाद भाजपा ने अबकी सभी सीटों पर चुनाव लड़ने का एलान कर उसके वोट बैंक में सेंध लगाने की तैयारी कर ली है। इन मुश्किलों से जूझने के लिए ही पार्टी ने अबकी एक दर्जन नए चेहरों को मैदान में उतारा है।
मिजोरम में वर्ष 2008 से ही ललथनहवला की अगुवाई वाली कांग्रेस सत्ता में है। वर्ष 2008 के विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को 39 फीसदी वोट और 40 में से 32 सीटें मिली थीं। विपक्षी मिजो नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) को वोट तो 31 फीसदी मिले थे। लेकिन उसे महज तीन सीटों से ही संतोष करना पड़ा था।
वर्ष 2013 के चुनावों में कांग्रेस के वोट भी बढ़े और सीटें भी। उसको मिलने वाले वोट बढ़ कर 45 फीसदी हो गए और सीटें 34 तक पहुंच गई। एमएनएफ ने पांच सीटें जरूर जीतीं। लेकिन उसके वोट घट कर 29 फीसदी रह गए। उस समय भाजपा ने 17 सीटों पर चुनाव लड़ा था। उसे एक भी सीट नहीं मिली थी। उसको मिलने वाले वोट भी 0.5 से घट कर 0.4 फीसदी रह गए थे। लेकिन अबकी एमएनएफ ने सत्ता में वापसी के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी है।
दूसरी ओर, भाजपा ने अबकी मुकाबले को तिकोना बनाने के लिए कमर कस ली है। कांग्रेस सरकार को अबकी सत्ता-विरोधी लहर के अलावा भाई-भतीजावाद, भ्रष्टाचार और ब्रू शरणार्थियों के मुद्दे से जूझना पड़ रहा है। हालांकि ललथनहवला का दावा है कि इन सबका चुनाव के नतीजों पर कोई असर नहीं पड़ेगा और पार्टी अबकी भी सरकार बनाएगी।
दूसरी ओर, एमएनएफ प्रमुख व पूर्व मुख्यमंत्री जोरमथांगा का दावा है कि राज्य के लोग कांग्रेस के शासन से आजिज आ चुके हैं। अबकी राज्य में बदलाव तय है।
उधर, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह ने भी पूर्वोत्तर को कांग्रेस-मुक्त करने का संकल्प दोहराते हुए कहा है कि पार्टी अबकी मिजोरम में भी सत्ता पर कब्जा करेगी। प्रदेश भाजपा अध्यक्ष जी.वी. लूना कहते हैं कि अब मिजोरम के लोगों के लिए पार्टी अछूत नहीं रही और उसे हर तबके के लोगों का भारी समर्थन मिल रहा है।