मिजोरम में होने वाले चुनावों से पहले अबकी चर्च के तमाम संगठनों ने भाजपा के खिलाफ रहस्यमय तरीके से चुप्पी साध रखी है। पहले यह तमाम संगठन इस भगवा पार्टी के खिलाफ काफी मुखर थे। लेकिन इस साल उन्होंने अब तक भाजपा के खिलाफ कोई टिप्पणी नहीं की है। इससे राज्य में राजनीतिक कयासों का बाजार तेज हो रहा है।
राज्य के तीन ईसाई-बहुल राज्यों में से दो मेघालय व नागालैंड में भाजपा पहले से ही सरकार में साझीदार है। अब मिजोरम में भी वह ताल ठोंक रही है। राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि इन तीनों राज्यों में सरकारी तंत्र व राजनीति पर चर्चों का असर बहुत ज्यादा है। भाजपा की हिंदुवादी राजनीति हो या फिर स्कूलों में योग सिखाने का प्रयास, चर्च हमेशा इनके खिलाफ मुखर रहे हैं। इससे पहले मिजोरम में भी तमाम संगठन भाजपा की नीतियों के खिलाफ थे।
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष जे.वी.लूना कहते हैं कि हमें चर्चों को यह समझाने में काफी मेहनत करनी पड़ रही है कि हमारा एजंडा हिंदुत्व नहीं बल्कि विकास है। वे मानते हैं कि बीते दो वर्षों के दौरान भाजपा के प्रति चर्चों का रवैया नरम हुआ है। यह पहला चुनाव है जब चर्च खुल कर भाजपा का विरोध नहीं कर रहा है। लूना मानते हैं कि भाजपा को विपक्ष के कुप्रचार का नुकसान सहना पड़ा है। यहां पांच बार चुनाव लड़ने के बावजूद पार्टी अब तक एक भी सीट नहीं जीत सकी है।
लेकिन लूना को उम्मीद है कि अबकी पार्टी का प्रदर्शन बेहतर रहेगा। इस साल की शुरुआत में चकमा स्वायत्त जिला परिषद के चुनावो में पार्टी ने 20 में से पांच सीटें जीती थीं। स्थानीय लोगों का कहना है कि राज्य की 87 फीसदी आबादी के ईसाई होने की वजह से यहां भाजपा की हिंदुत्ववादी राजनीति के लिए कोई जगह नहीं है। लेकिन उसके मैदान में उतरने से ललोगों के समक्ष एक विकल्प तो पैदा हो ही गया है।