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मजदूर हुआ मजबूर, ट्रक के भाड़े में गंवा रहा है जमा-पूंजी, न संक्रमण से सुरक्षा न ही जान का भरोसा

Mon, 18 May 2020 04:46 PM IST
Harendra Chaudhary जितेंद्र भारद्वाज, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के अध्यक्ष कुलतरण सिंह अटवाल ने भी सभी ट्रक मालिकों और ड्राइवरों से अपील की है कि वे अवैध तौर पर किसी को गाड़ी में न बैठाएं। कोरोना की लड़ाई में यह कदम नुकसानदायक साबित हो सकता है।
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ट्रक में बैठे प्रवासी मजदूर - फोटो : PTI (File)
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विस्तार
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लॉकडाउन में देश का मजदूर 'मजबूर' बन गया है। उसकी जमा-पूंजी ट्रक का भाड़ा देने में जा रही है। इसके बावजूद न कोरोना से सुरक्षा मिल रही और न ही सड़क पर जान का भरोसा है। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला कहते हैं कि अभी तक 135 मजदूर मारे जा चुके हैं।
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देश के विभिन्न हिस्सों में मजदूरों पर लाठी भांजी जा रही हैं। राज्यसभा सांसद दीपेंद्र हुड्डा ने कहा, मजदूर को मजबूर बना दिया गया है। गरीब को पुलिस सहारा देने की बजाय क्रूरता से पीटेगी तो क्या डकैत बचाने आएंगे।

ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस के अध्यक्ष कुलतरण सिंह अटवाल ने भी सभी ट्रक मालिकों और ड्राइवरों से अपील की है कि वे अवैध तौर पर किसी को गाड़ी में न बैठाएं। कोरोना की लड़ाई में यह कदम नुकसानदायक साबित हो सकता है।

ट्रकों में ठूंस-ठूंस कर बैठाए मजदूर

लॉकडाउन 1, 2 और 3 में पुलिस ने बड़ी संख्या में ऐसे ट्रक पकड़े थे, जो गैरकानूनी तरीके से मजदूरों को ले जा रहे थे। इसके बावजूद ट्रकों में मजदूरों का सफर जारी है। पैसों के लालच में ट्रक ड्राइवर मजदूरों को बैठा लेते हैं।

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वहां सोशल डिस्टेंसिंग, मास्क या सैनिटाइजर जैसी कोई बात नहीं होती। एक सामान्य ट्रक में 80 से 100 मजदूर तक बैठाए जाते हैं। कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला कहते हैं कि केंद्र सरकार और कुछ राज्यों ने मजदूरों के साथ खेल शुरू कर रखा है।

केंद्र कहता है कि हमारे पास पर्याप्त संख्या में ट्रेन हैं, मगर राज्य मंजूरी नहीं दे रहे। दूसरी ओर राज्यों का आरोप है कि केंद्र की ओर से ट्रेन देने में टालमटोल किया जा रहा है। इसी चक्कर में मजदूरों को अपने जीवन से खिलवाड़ कर ट्रकों में बैठने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

वे कई गुना भाड़ा देते हैं और पुलिस की पिटाई भी खाते हैं। पूरा भाड़ा देने के बावजूद उन्हें बीच रास्ते में उतार दिया जाता है। बीते दिनों हुए ऐसे ही सड़क हादसों में दर्जनों मजदूर मारे गए।

लग गई जमा पूंजी, मगर घर तब भी नहीं आया

लॉकडाउन के दौरान ट्रेन चलने से पहले और उसके बाद तक लाखों मजदूर ट्रकों और दूसरे प्राइवेट वाहन चालकों के जरिए ठगे गए हैं। दिल्ली के पड़ोसी राज्यों से आने वाले मजदूरों के पांच हजार रुपये तक खर्च हो गए हैं।

निर्माण कार्य में लगे ठेकेदार मोहम्मद जमील बताते हैं कि पहले और दूसरे लॉकडाउन में बहुत से मजदूर दिल्ली पहुंचने के प्रयासों में लगे थे। लोकल चालक, जिन्हें मालूम था कि पुलिस दिल्ली में नहीं घुसने देगी, लेकिन इसके बावजूद उन्होंने भारी भरकम किराया लेकर मजदूरों को बैठाया।

बाद में उन मजदूरों को दिल्ली बॉर्डर या बहादुरगढ़ से वापस लौटा दिया गया। ऐसा एक बार नहीं, बल्कि कई दफा हुआ है। बाद में जब पैसा खत्म हो गया तो वे लोग पैदल चलने लगे। बीच में कोई वाहन मिल गया तो बचा-खुचा पैसा देकर उसमें चढ़ गए।

आगे पुलिस ने फिर पकड़ लिया तो दोबारा से सड़क पर आ बैठे। देश में करीब 12 लाख ट्रक चल रहे हैं। अधिकांश ट्रकों में कोई न कोई मजदूर छिपा कर बैठा दिया जाता है। गुजरात के राजकोट में भी घर जाने की मांग को लेकर प्रवासी मजदूर सड़क पर उतर आए।

राजकोट में शापर-वेरावल हाईवे पर रविवार को आक्रोशित मजदूरों ने जमकर हंगामा किया। आक्रोशित मजदूरों ने तोड़फोड़ की और कई वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया। राजकोट के पुलिस अधीक्षक बलराम मीणा भी घायल हो गए। ऐसी घटनाएं देश के दूसरे हिस्सों में भी हो रही हैं।

मजदूरों को लेकर बयानबाजी का दौर भी चरम पर है... 

आप सांसद संजय सिंह कहते हैं, भाजपा केवल अमीरों की पार्टी है। इसने गरीबों को तो सड़कों पर मरने के लिए छोड़ दिया है। आज गरीब मजदूर कहीं रेलवे ट्रैक पर मर रहा है, कहीं हाईवे पर सड़क हादसों में मर रहा है, कहीं पैदल चल-चल कर भूख से तड़प-तड़प कर मर रहा है।

हालात इतने भयावह हैं कि छोटे-छोटे मासूम बच्चे भूखे प्यासे सड़कों पर चल रहे हैं। छोटे-छोटे बच्चे थक कर चूर हो कर सूटकेस पर सो रहे हैं। भाजपा धृतराष्ट्र की तरह आंख पर पट्टी बांधकर बैठी हुई है।

वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा, प्रवासी मुद्दे पर विपक्ष को राजनीति करने की जगह मिलकर काम करना चाहिए। प्रवासियों को ट्रेन में बिठाकर, उनके खाने का इंतजाम कर घरों तक पहुंचा रहे हैं।

कांग्रेस पार्टी के नेता रणदीप सुरजेवाला कहते हैं कि ये मजदूर भाजपा को कभी माफ नहीं करेंगे। मजदूरों के साथ चल रही महिलाओं और बच्चों का कष्ट केंद्र सरकार को नजर नहीं आता। अगर कोई मजदूरों की मदद करने के लिए आगे आता है तो उसे रोक दिया जाता है।

 

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