भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (भाकपा) के वरिष्ठ नेता डी. राजा ने केंद्र सरकार द्वारा सार्वजनिक क्षेत्र के कई बैंकों के परस्पर विलय की आलोचना करते हुए इसे सरकारी बैंकों का ‘राष्ट्रीयकरण खत्म करने’ वाला कदम बताया।
राजा ने यहां कहा कि मोदी सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के विलय के नाम पर उनका राष्ट्रीयकरण खत्म करने की कोशिश कर रही है। सरकार भले ही यह दावा कर रही हो कि अर्थव्यवस्था का मूलभूत आधार मजबूत है मगर सच्चाई यह है कि सरकार अर्थव्यवस्था के सभी मूल आधारों को तबाह कर रही है।
भाकपा की दो दिवसीय बैठक में शिरकत करने यहां आए राजा ने कहा कि अर्थव्यवस्था बुरी हालत में है और मोदी सरकार बढ़ती बेरोजगारी, महंगाई और अनाज के संकट के सवालों के जवाब नहीं देना चाहती। बैंकों के विलय का असल मकसद कॉरपोरेट घरानों के लिए पूंजी जुटाना है और कर्ज नीति को उनके हितों के हिसाब से ढालना है।
उन्होंने कहा कि दुनिया में कभी भी बड़े बैंकों ने अर्थव्यवस्था को सहारा नहीं दिया है। यहां तक कि अमेरिका में भी बड़े बैंक मंदी के दौरान धराशायी हो गए थे। वर्ष 2008 में आई इस मंदी में भारत संकट से सिर्फ इसलिए बच सका क्योंकि उसके पास सार्वजनिक क्षेत्र के मजबूत बैंक और बीमा कंपनियां थीं।
राजा ने कहा कि अब हाल यह है कि मोदी सरकार के किसी फैसले के खिलाफ अगर आवाज उठाई जाए या कोई सवाल कर दिया जाए तो उस शख्स को देशद्रोही और आतंकवादी करार दे दिया जाता है। यह बहुत खतरनाक चलन बन गया है। भाजपा नेता ने राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) के मुद्दे पर कहा कि एनआरसी से अनेक सवाल खड़े हुए हैं और भाजपा तथा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के तमाम दावे धराशायी हो गए हैं।