जम्मू कश्मीर से अफस्पा को आंशिक रूप से हटाने की मांग को लेकर चाहे जितनी सियासत चलती रही हो लेकिन हकीकत यह है कि महबूबा मुफ्ती की सरकार ने केंद्र के पास इस आशय का कोई प्रस्ताव अबतक नहीं भेजा है।
इससे पहले मुफ्ती मोहम्मद की सरकार ने भी ऐसी कोई मांग नहीं की थी। उमर अब्दुल्ला की सरकार ने यूपीए शासनकाल में अफस्पा हटाने का विधिवत प्रस्ताव दो बार केंद्र के पास भेजा था। वैसे केंद्र का रुख इस मामले में बिल्कुल साफ है। केंद्रीय गृह मंत्रालय फिलहाल अफस्पा हटाने के मूड में नहीं है। इस मामले को सेना के फैसले पर छोड़ दिया गया है।
गौरतलब है कि जम्मू कश्मीर के अपेक्षाकृत शांत इलाकों से क्रमबद्ध तरीके से अफस्पा को हटाए जाने की बात पीडीपी और भाजपा के गठबंधन एजेंडे में शुमार है। मुफ्ती मोहम्मद सईद ने पिछले साल सरकार गठन से पहले दो माह की मैराथन बैठकों के बाद न्यूनतम साझा कार्यक्रम तैयार किया था जिसे गठबंधन एजेंडा की संज्ञा दी गई। मुफ्ती मोहम्मद के निधन के बाद सरकार गठन के मुद्दे पर ढ़ाई माह तक असमंजस की स्थिति रही। तब महबूबा ने घाटी में विश्वास के माहौल की बहाली पर जोर दिया जिसमें अफस्पा को आंशिक रूप से क्रमवार हटाने का मुद्दा शामिल रहा। वोट बैंक को संतुष्ट करने के लिए पीडीपी इन मुद्दों को उठाती रही है।
गृह राज्य मंत्री किरन रिजिजू ने कहा है कि जम्मू कश्मीर सरकार की ओर से 2011 और 2013 में दो बार अफस्पा को हटाए जाने के प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास भेजे गए थे। उसके बाद ऐसा कोई विधिवत प्रस्ताव केंद्र के पास नहीं है। फिलहाल अफस्पा हटाए जाने का कोई प्रस्ताव केंद्र के पास विचाराधीन नहीं है।
जम्मू कश्मीर के अनंतनाग, बारामूला, बडगाम, कुपवाड़ा, पुलवामा, श्रीनगर, जम्मू, कठुआ, उधमपुर, पुंछ, राजोरी, और डोडा जिलों में अफस्पा लागू है। जम्मू कश्मीर के अलावा असम और नागालैंड, इंफाल नगरपालिका छोड़कर मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश के तिरप, चांगलांग और लांगडिंग जिले और असम से सटे 16 पुलिस थाना क्षेत्र में अफस्पा वजूद में है। मेघालय में असम सीमा से लगी 20 किलोमीटर की चौड़ी पट्टी भी अफस्पा के क्षेत्र में है। त्रिपुरा सरकार की अधिसूचना के तहत पिछले साल वहां 30 पुलिस थाना क्षेत्र से अफस्पा हटा दिया गया था।