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मीडिया: अमेरिका में छह लाख मौतें हुईं पर हमारी तरह दृश्य नहीं दिखाए, पत्रकारिता दिवस पर हुई सार्थक चर्चा

Fri, 28 May 2021 10:21 PM IST
सुरेंद्र जोशी न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

भारतीय जन संचार संस्थान ने 'कोरोना काल के बाद की पत्रकारिता' विषय पर हिंदी पत्रकारिता दिवस के मौके पर 'शुक्रवार संवाद' का आयोजन किया। इसमें वरिष्ठ पत्रकारों ने पत्रकारिता की मर्यादा व जिम्मेदारी को लेकर अहम विचार पेश किए।
 
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भारतीय जन संचार संस्थान द्वारा हिंदी पत्रकारिता दिवस के मौके पर आयोजित ‘शुक्रवार संवाद’ में बोलते वक्ता - फोटो : self
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विस्तार
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'तन का कोरोना यदि तन से तन में फैला, तो मन का कोरोना भी मीडिया के एक वर्ग ने बड़ी तेजी से फैलाया। मीडिया को लोगों के सरोकारों का ध्यान रखना होगा, उनके प्रति संवेदनशीलता रखनी होगी। यदि सत्य दिखाना पत्रकारिता का दायित्व है, तो ढांढस देना, दिलासा देना, आशा देना, उम्मीद देना भी उसी का उत्तरदायित्व है। अमेरिका में करीब छह लाख मौते हुईं, लेकिन वहां हमारे चैनलों जैसे दृश्य नहीं दिखाए गए।' 

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यह कहना है वरिष्ठ पत्रकार उमेश उपाध्याय का। भारतीय जन संचार संस्थान द्वारा हिंदी पत्रकारिता दिवस के मौके पर आयोजित ‘शुक्रवार संवाद’ में उन्होंने ये अहम बातें कहीं। चर्चा का विषय था 'कोरोना काल के बाद की पत्रकारिता'। कार्यक्रम में 'दैनिक ट्रिब्यून' चंडीगढ़ के संपादक राजकुमार सिंह और ‘हिंदुस्तान’ की कार्यकारी संपादक जयंती रंगनाथन ने भी अपने विचार साझा किए। बता दें, हर साल 30 मई को हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाया जाता है। इसी दिन देश के पहले हिंदी अखबार 'उदन्त मार्तण्ड' का प्रकाशन हुआ था।

मीडिया के छात्रों को संबोधित करते हुए उमेश उपाध्याय ने कहा कि अमेरिका में 11 सितंबर के आतंकी हमले के बाद भी पीड़ितों के दृश्य नहीं दिखाए गए थे। हमारे यहां कुछ वर्जनाएं हैं, जिन पर ध्यान देना होगा। सत्य दिखाएं, लेकिन कैसे दिखाएं, इस पर गौर करना जरूरी है। चाकू चोर की तरह चलाना है या सर्जन की तरह यह तय करना होगा
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समाज में अवसाद कैसे दूर हो यह सोचना जरूरी : प्रो. द्विवेदी
भारतीय जन संचार संस्थान के महानिदेशक प्रो. संजय द्विवेदी ने कहा कि समाज के अवसाद, चिंताएं कैसे दूर हों, इस पर चिंतन आवश्यक है। यह सामाजिक संवेदनाएं जगाने का समय है। सारे काम सरकार पर नहीं छोड़े जा सकते। विद्यार्थियों के लिए इस समय जमीन पर जाकर कर काम करना जरूरी है। वे अपने आसपास के लोगों को संबल दें। हमें ऐसी शिक्षा चाहिए, जो इंसान को इंसान बनाए।

महामारी ने जीवन मूल्यों को झकझोरा, पत्रकार भी 'फ्रंटलाइन योद्धा'
राजकुमार सिंह ने कहा कि कोरोना काल ने केवल पत्रकारिता को ही नहीं, बल्कि हमारी जीवन शैली और जीवन मूल्यों को भी झकझोर कर रख दिया। पत्रकारिता ने कई अनपेक्षित बदलाव देखे। उस पर कई तरफ से प्रहार हुआ। सबसे ज्यादा असर तो यह हुआ कि लोगों ने अखबार लेना बंद कर दिया। कोरोना की पहली लहर के बाद 40 से 50 प्रतिशत पाठक ही अखबारों की ओर लौट पाए। कोरोना काल में अपनी जान गंवाने वाले पत्रकारों का जिक्र करते हुए उन्होने कहा कि देश में ऐसा कोई आंकड़ा नहीं कि कितने पत्रकारों की जान गईं। यह आंकड़ा चिकित्सा जगत के लोगों की मौतों के आंकड़े से कहीं ज्यादा हो सकता है। पत्रकार भी 'फ्रंटलाइन योद्धा' हैं उनकी भी चिंता की जानी चाहिए।

हमारी डीएनए पश्चिम देशों से अलग : जयंती रंगनाथन
सुश्री जयंती रंगनाथन ने कहा कि मीडिया को सकारात्मक खबरें देनी होंगी। उसे लोगों को बताना होगा कि पुराने दिन लौट कर आएंगे, लेकिन उसमें थोड़ा वक्त लगेगा। हमारा डीएनए पश्चिमी देशों से भिन्न है, जैसा वहां है, यहां ऐसा नहीं होगा। हमें भी अपने पाठकों की मदद करनी होगी। हमें लोगों के सरोकारों से जुड़ना होगा। सकारात्मक खबरों का दौर लौटेगा और प्रिंट मीडिया मजबूती से जमा रहेगा।

कार्यक्रम का संचालन अपना रेडियो और आईटी विभाग की विभागाध्यक्ष प्रोफेसर संगीता प्रणवेंद्र ने किया। डीन (अकादमिक) प्रो. गोविन्द सिंह ने धन्यवाद ज्ञापन किया।

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