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मराठा आरक्षण : सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण के मुद्दे पर अगली सुनवाई के लिए तय किए छह सवाल

Tue, 09 Mar 2021 03:38 AM IST
Jeet Kumar एजेंसी, नई दिल्ली।
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supreme court - फोटो : ANI
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सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस अशोक भूषण की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने सोमवार को मराठा आरक्षण को लेकर वर्चुअल सुनवाई शुरू की है। पीठ ने 50 फीसदी से ज्यादा आरक्षण दिए जाने के मुद्दे पर सभी राज्यों को नोटिस जारी किया और राज्य सरकारों का तर्क जानना चाह रहा है।

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मराठा आरक्षण और इससे जुड़े संवैधानिक प्रश्नों पर पीठ अगली सुनवाई 15 मार्च को करेगी। सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए छह सवाल भी तय किए हैं। पीठ ने कहा कि  अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल का भी मत है कि इस मामले में राज्यों को सुना जाए।

पीठ ने मामले में सुनवाई के लिए कार्यक्रम तय करते हुए कहा कि सुनवाई के अगले दिन किसी भी पक्ष की ओर से स्थगन का कोई अनुरोध नहीं किया जाएगा। इसमें कहा गया है कि विभिन्न राज्यों की ओर से पेश होने वाले वकील को नोटिस भेजे जाएंगे और मंगलवार को ई-मेल द्वारा राज्यों के मुख्य सचिव को भी भेजे जाएंगे।
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ये हैं छह सवाल, जो तय करेंगे मामले की दशा और दिशा

  • क्या अनुच्छेद 342ए किसी भी पिछड़े वर्ग के नागरिकों के संबंध में कानून बनाने या वर्गीकृत करने की राज्यों की शक्ति का हनन करता है।
  • क्या ऐसे कानून बनाए जाने से संविधान की संघीय नीति या संरचना प्रभावित होती है, जिस पर वह विचार करने का प्रस्ताव रखता है।
  • क्या संविधान का 102वां संशोधन राज्य की विधायिका को सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों का निर्धारण करने वाले कानून को लागू करने से वंचित करता है और इसकी सक्षम शक्ति के तहत उक्त समुदाय को लाभ प्रदान कर रहा है?
  • क्या राज्यों को किसी भी पिछड़े वर्ग के संबंध में कानून बनाने की शक्ति अनुच्छेद 15 (4) और 16 (4) के तहत अनुच्छेद 342 (ए) द्वारा भारत के संविधान के अनुच्छेद 366 (26 सी) के साथ पढ़ा जाता है?
  • क्या सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़ा वर्ग अधिनियम 2018 के तहत महाराष्ट्र राज्य आरक्षण 2019 में संशोधित कर 50 प्रतिशत आरक्षण के अलावा मराठा समुदाय के लिए 12 से 13 फीसदी का आरक्षण देना इंदिरा साहनी मामले में 1992 के फैसले के अनुसार असाधारण परिस्थितियों के दायरे में आता है।
  • क्या एमसी गायकवाड़ की अध्यक्षता वाले महाराष्ट्र राज्य पिछड़ा आयोग की रिपोर्ट के आधार पर राज्य सरकार ने इंदिरा साहनी मामले में दिए गए फैसले में अपवाद के आधार पर राज्य में असाधारण स्थिति और असाधारण परिस्थितियों के अस्तित्व का मामला बनाया?

मराठा आरक्षण पर वकीलों और सरकार ने क्या कहा
वेणुगोपाल ने कहा, अनुच्छेद 338 बी और 342 ए प्रत्येक राज्य की शक्ति को प्रभावित करते हैं। जैसा कि मैं समझता हूं कोई भी राज्य 2018 के बाद किसी वर्ग को आरक्षण नहीं दे सकता है। इसलिए महाराष्ट्र एक वर्ग को पिछड़े वर्ग के रूप में घोषित नहीं कर सकता था।

वहीं, मराठा आरक्षण पर वकील गोपाल शंकर नारायण ने कहा, आरक्षण के मसले पर कई राज्यों द्वारा मुद्दे उठाए गए हैं, जो अलग-अलग विषयों के हैं। आरक्षण से जुड़े अलग-अलग मामले हैं, जो कहीं न कहीं इस मामले से जुड़े हैं।

वहीं, महाराष्ट्र सरकार के वकील मुकुल रोहतगी ने कहा कि इस मामले में अनुच्छेद 342ए की व्याख्या भी शामिल है। यह सभी राज्यों को प्रभावित करेगा, इसलिए सभी राज्यों को सुने बिना इस मामले में फैसला नहीं किया जा सकता।

वरिष्ठ कपिल सिब्बल ने कहा कि सभी राज्यों से सांविधानिक सवाल किया गया। कोर्ट को सिर्फ केंद्र और महाराष्ट्र की सुनवाई नहीं करनी चाहिए, बल्कि सभी राज्यों को नोटिस जारी करना चाहिए।

क्या हाईकोर्ट मंडल कमीशन मामले में आए फैसले को मानने के लिए बाध्य नहीं
शीर्ष अदालत महाराष्ट्र में नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में मराठों के लिए शिक्षण संस्थानों ब नौकरियों में 12 से 13 फीसदी आरक्षण देने के राज्य सरकार के निर्णय को सही ठहराए जाने के बॉम्बे हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रही है। सुप्रीम कोर्ट ने फिलहाल मराठा आरक्षण पर अंतरिम रोक लगा रखी है।

याचिकाकर्ताओं ने हाईकोर्ट के आदेश की वैधता पर सवाल उठाते हुए कहा है कि क्या हाईकोर्ट, सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की पीठ के निर्णय (मंडल कमीशन मामले) के मानने को बाध्य नहीं है, जिसमें 50 फीसदी आरक्षण की सीमा तय की गई थी। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि मराठा आरक्षण देने से आरक्षण 73 फीसदी जा पहुंची है, ऐसे में सामान्य वर्ग के लोगों के लिए अवसर बेहद कम हो गए हैं।

यह है संविधान का अनुच्छेद 15(4) और 16 (4)
अनुच्छेद 15(4): राज्य को सामाजिक और शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्ग के नागरिकों या अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति की उन्नति के लिये विशेष प्रावधान करने से नहीं रोका जाएगा।

अनुच्छेद 16 (4): राज्य को नागरिकों के किसी भी पिछड़े वर्ग के पक्ष में नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए कोई प्रावधान करने से नहीं रोका जाएगा, यदि राज्य की राय में राज्य के तहत सेवाओं में उस वर्ग का पर्याप्त रूप से प्रतिनिधित्व नहीं है।

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