मराठा आरक्षण मामले में महाराष्ट्र सरकार को बांबे हाईकोर्ट से चार सप्ताह की और मोहलत मिल गई है। बृहस्पतिवार को हाईकोर्ट ने इस मुद्दे पर हलफनामा पेश नहीं करने पर सरकार को फटकार लगाई। अदालत ने मामले की सुनवाई स्थगित कर चार सप्ताह में शपथपत्र पेश करने की ताकीद करते हुए अगली सुनवाई सात दिसंबर को तय की है।मराठा आरक्षण के मामले में सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अदालत से दरख्वास्त की गई कि शपथपत्र पेश करने के लिए कुछ समय दिया जाए। इस पर कोर्ट ने सरकार के रवैये पर नाराजगी जताई। अदालत ने जहां याचिकाकर्ताओं को दो सप्ताह का समय दिया वहीं सरकार को चार सप्ताह की मोहलत देते हुए ताकीद की कि यह उनके लिए अंतिम मौका है और उसके बाद सुनवाई स्थगित कर दी। गौरतलब है कि महाराष्ट्र में कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन सरकार ने अपने कार्यकाल के अंतिम समय साल 2014 में मराठा समाज को शिक्षा और नौकरी में 16 फीसदी और मुस्लिम को पांच फीसदी आरक्षण लागू किया था।
मामला कोर्ट में पहुंचा तो टिक नहीं पाया। उसके बाद मराठा आरक्षण को लेकर अलग-अलग याचिकाएं दायर हुई और मराठा समाज इसको लेकर आंदोलन भी कर रहा है। इस आंदोलन ने सत्ताधारी दल भाजपा की नींद हराम हो गई है। हालांकि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने मराठा आरक्षण को लेकर सकारात्मक रवैया अपनाया है लेकिन, हलफनामा पेश करने में लेट-लतीफी की जा रही है। फडणवीस ने बृहस्पतिवार को फिर दोहराया कि सरकार मराठा आरक्षण देने के लिए कटिबद्ध है। उन्होंने कहा कि मराठा आरक्षण को लेकर जल्द ही सरकार अदालत में अपनी भूमिका स्पष्ट करेगी।
उधर, कोर्ट में सरकार की लापरवाही को लेकर विपक्ष ने सरकार पर हमला बोल दिया है। एनसीपी के प्रवक्ता नवाब मलिक ने कहा कि सरकार जान बूझकर ऐसा कर रही है। मलिक ने आरोप लगाया कि फडणवीस ने पहले ही मराठा आरक्षण का विरोध किया था और कहा था कि कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन सरकार के सभी फैसलों को उनकी सरकार पलट देगी। उन्होंने कहा कि मराठा समाज की जनसंख्या को लेकर केंद्र सरकार से डाटा मंगाने की बात कही जा रही है जबकि सरकार के पास सभी आंकड़े मौजूद हैं।