महाराष्ट्र में मराठों को आरक्षण देने की मांग 40 साल से शुरू है। लेकिन बुधवार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद सूबे की तकरीबन सभी राजनीतिक पार्टियों में मराठा समाज के प्रति सहानुभूति दर्शाने की स्पर्धा शुरू हो चुकी है। मराठा आरक्षण की मांग को लेकर पहली बार साल 1982 में तत्कालीन माथाड़ी कामगार नेता अण्णासाहेब पाटिल के नेतृत्व में आंदोलन शुरू हुआ था।
राज्य सरकार ने उस समय सांविधानिक अड़चन का हवाला देते हुए जब मराठों को आरक्षण देने में असमर्थता जताई तो पाटिल ने आत्महत्या कर अपना बलिदान दे दिया था। तब से लेकर अभी तक सभी पार्टियों ने अपने राजनीतिक हितों की खातिर समय-समय पर इस मुद्दे को तूल दिया। लेकिन मराठा समाज हर बार राजनीतिक दलों के कोरे आश्वासन का शिकार बनता रहा।
साल 2004 में तत्कालीन एनसीपी नेता शालिनीताई पाटिल ने छावा संगठन और अपने समर्थकों के जरिए आर्थिक आधार पर मराठा समाज के लिए आरक्षण की मांग की और मुंबई के आजाद मैदान में आंदोलन किया था। तब उन्हें पार्टी का समर्थन भी नहीं मिला और पार्टी से बाहर होना पड़ा था।
इसके बाद साल 2009 में लोकसभा चुनाव के मौके पर एक बार फिर मराठा आरक्षण को राजनीतिक हथियार बनाया गया था। लेकिन, उसके बाद मामला ठंडा पड़ गया। साल 2014 में तत्कालीन मुख्यमंत्री पृथ्वीराज चव्हाण ने विधानसभा चुनाव में पराजय की आशंका को भांपते हुए मराठा आरक्षण कार्ड खेला था। फिर भी कांग्रेस-एनसीपी गठबंधन को हार नसीब हुई।
साथ ही, चव्हाण के मराठा आरक्षण कानून को बॉॅम्बे हाईकोर्ट ने भी खारिज कर दिया था। इसके बाद सूबे में देवेन्द्र फडणवीस के नेतृत्व में महायुति की सरकार बनी। इसी बीच अहमदनगर के कापर्डी में एक मराठा युवती के दुष्कर्म के बाद निर्मम हत्या होने पर मराठा समाज एक बार फिर तैयार हुआ और लाखों की संख्या में मराठों ने मूक मोर्चा निकालकर फडणवीस सरकार की नाक में दम कर दिया था।
इसके बाद मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने पिछड़ा वर्ग आयोग गठित कर नवंबर 2018 में मराठा समाज को शिक्षा और नौकरियों में 16 फीसदी आरक्षण देने का कानून पारित किया था।
जून 2019 में बॉम्बे हाईकोर्ट ने इसे कम करते हुए शिक्षा में 12 फीसदी और नौकरियों में 13 फीसदी आरक्षण निर्धारित किया था। लेकिन तीन साल में ही सुप्रीम कोर्ट ने मराठा आरक्षण कानून को असंवैधानिक करार दे दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद महाराष्ट्र में गरमाई मराठा राजनीति
महाराष्ट्र में मराठा आरक्षण रद्द करने के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद सूबे में मराठा राजनीति एक बार फिर गरमा गई है। मराठा समाज हार मानने की बजाय फिर से आंदोलन की तैयारी में जुट गया है।
मराठा संगठनों ने तय किया है कि लॉकडाउन खत्म होने के बाद 16 मई से दोबारा मराठा आंदोलन शुरू होगा और लाखों मराठा फिर से सड़कों पर उतरेंगे। इससे आने वाले समय में महाराष्ट्र सरकार की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बृहस्पतिवार को मराठवाड़ा के बीड जिले में मराठा संगठनों की महत्वपूर्ण बैठक हुई जिसमें जिलाधिकारी को आगामी मोर्चे से संबंधित ज्ञापन देने का फैसला किया गया है।
शिव संग्राम के अध्यक्ष व विधायक विनायक मेटे ने कहा कि आरक्षण के मुद्दे पर मराठा समाज शांत नहीं बैठेगा बल्कि सड़क पर उतरकर आक्रामक आंदोलन करेगा। उन्होंने कहा कि पहला मराठा मोर्चा बीड में निकाला जाएगा।
उसके बाद पूरे राज्य में इस तरह के मोर्चे निकाले जाएंगे। उन्होंने मांग की कि राज्य सरकार की ओर से गठित मराठा आरक्षण उपसमिति के अध्यक्ष अशोक चव्हाण को इस्तीफा दे देना चाहिए।