नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में सुरक्षा बलों की पकड़ मजबूत होती जा रही है। पहले के मुकाबले अब नक्सली घटनाओं में भी खासी कमी देखने को मिली है। वामपंथी उग्रवादी हिंसा की घटनाएं जो 2009 में 2258 थीं, 2020 में यह संख्या 70 फीसदी तक घटकर 655 रह गई हैं। नतीजा, नक्सली बौखला उठे हैं। वे अब बच्चों के सहारे अपनी मारक क्षमता बढ़ाने की रणनीति बना रहे हैं। इसके लिए नक्सली समूह बच्चों को अफगानी लड़ाकों की तर्ज पर 'इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस' यानी आईईडी ब्लास्ट तैयार करने की ट्रेनिंग दे रहे हैं।
आईईडी कहां पर लगाई जाती है और कैसे इसे इस्तेमाल करना है, यह सब बच्चों को सिखाया जा रहा है। सुरक्षा बलों का कहना है कि नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में भर्ती का संकट है। नए लोग उनके साथ नहीं जुड़ पा रहे हैं। दूसरा, कई बड़े नक्सली सुरक्षा बलों के सामने सरेंडर कर चुके हैं। इसके चलते कई राज्यों में नक्सलियों ने अब बच्चों को अपना सॉफ्ट टारगेट बनाना शुरू कर दिया है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय के सूत्रों का कहना है कि नक्सलियों द्वारा अपने संगठन में बच्चों को भर्ती करने की रिपोर्ट केंद्र सरकार को भेज दी गई है। इतना ही नहीं, इस रिपोर्ट में शामिल तथ्यों से झारखंड एवं छत्तीसगढ़ सरकारों के अलावा केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियों और नक्सल प्रभावित इलाकों में तैनात सुरक्षा बलों को भी अवगत करा दिया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि बच्चों को फौजी ट्रेनिंग दी जा रही है। सुरक्षा बलों का कहना है कि आईईडी बनाने और उसे लगाने की ट्रेनिंग का तरीका बिल्कुल अफगानी आतंकियों के समूहों में देखने को मिलता है। जम्मू कश्मीर में सक्रिय कई आतंकी संगठनों के सदस्य भी अफगानिस्तान से आईईडी तैयार करने का प्रशिक्षण लेकर आए हैं। अब नक्सली भी ग्रामीण बच्चों को अपने संगठन में शामिल कर उन्हें आईईडी तैयार करना सिखा रहे हैं।
बच्चों को आईईडी बनाने की ट्रेनिंग देने के पीछे नक्सलियों के कई मकसद हैं। पहला, किसी भी इलाके में बच्चों पर कोई शक नहीं करता। वे आईईडी तैयार करने के उपकरण आसानी से इधर-उधर ले जा सकते हैं। सुरक्षा बलों को उन पर शक न हो, इसके लिए नक्सलियों ने उन्हें स्कूल बैग मुहैया कराया है। उस बैग पर निकटवर्ती सरकारी स्कूल का नाम लिखा रहता है। उसमें कुछ किताबें भी रख दी जाती हैं ताकि शक की कोई गुंजाइश ही न रहे।
आईईडी लगाने के लिए जहां भी सड़क का कोई हिस्सा टूटा रहता है और वहां से सुरक्षा बलों के वाहन गुजरते हैं, बच्चे अपनी ट्रेनिंग के मुताबिक उस जगह पर पहुंच जाते हैं। उनके साथ गांव के कई दूसरे बच्चे भी रहते हैं। यह अलग बात है कि गांव के सभी बच्चों को यह बात नहीं मालूम होती कि फलां बच्चा नक्सली समूह में भर्ती हो गया है।
सुरक्षा बलों के एक बड़े अधिकारी जो कई वर्षों से छत्तीसगढ़ में तैनात हैं, वे बताते हैं, नक्सलियों ने बच्चों का सहारा लेकर अपनी मारक क्षमता बढ़ाने का प्लान तैयार किया है। बच्चों को यह भी बताया गया है कि आईईडी को रिमोट कंट्रोल, इंफ्रारेड, मैग्नेटिक ट्रिगर्स, प्रेशर-सेंसिटिव बार्स या ट्रिप वायर की मदद से संचालित किया जाता है। बच्चों को ज्यादा रिमोट कंट्रोल से ही आईईडी विस्फोट करने की ट्रेनिंग दी जा रही है। प्रेशर कूकर बम कैसे तैयार होता है, ये भी बच्चों को सिखाया गया है।
आत्म समर्पण कर चुके नक्सलियों ने सुरक्षा बलों को बताया कि आईईडी विस्फोट करने के लिए विज्ञान की तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है। जैसे सड़क पर कोई वाहन आ रहा है तो आईईडी विस्फोट के जरिए उसे कैसे उड़ाना है, ये सिखाया जाता है। कितने मीटर दूरी से रिमोट कंट्रोल दबाना है और उसके बाद भागना नहीं है। पशुओं को हांकने के बहाने उनके पीछे दौड़ना है, ताकि सुरक्षा बलों को लगे कि बच्चों से पशु संभल नहीं रहे हैं।
रात के समय पेड़ पर सफेद कपड़ा बांधकर विस्फोट करने की ट्रेनिंग दी गई है। इसका मतलब कोई गाड़ी सामने से आ रही है, उसकी लाइट जल रही है, वह जैसे ही आईईडी वाले स्थान के ऊपर पहुंचेगी तो साइड में लगे पेड़ पर अंधेरा छा जाएगा। कपड़ा नहीं दिखेगा। यानी वह गाड़ी अब आईईडी वाली जगह पर है, तभी रिमोट दबाना है।
झारखंड के पश्चिम सिंहभूम के होयातू गांव के वन क्षेत्र में आईईडी बम धमाके में तीन जवान शहीद हो गए थे। गत चार मार्च को सीआरपीएफ की 197 बटालियन का जवान आईईडी विस्फोट में घायल हो गया था। 14 मार्च को छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित बीजापुर जिले में सुरक्षाबलों को निशाना बनाने के लिए आईईडी लगाते समय उसमें विस्फोट हो गया। इससे एक नक्सली मौके पर ही मारा गया। केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी.किशन रेड्डी के अनुसार, नक्सली क्षेत्रों में आम नागरिकों और सुरक्षा बलों के मारे जाने की संख्या 82 फीसदी तक घट गई है। साल 2010 में 1005 मौतें हुई थीं, जबकि 2020 में वह संख्या घटकर 183 रह गई है। कथित हिंसा की रिपोर्ट करने वाले जिलों की संख्या आठ साल पहले 76 थी, 2020 में वह संख्या घट कर 53 हो गई है।