महाराष्ट्र में चार दशक से भी अधिक समय से मराठा आरक्षण की मांग उठती रही है, लेकिन हाल के दिनों में यह आंदोलन तेज हो गया है। इसके केंद्र में हैं मनोज जरांगे पाटिल। जालना के एक होटल में कभी वेटर रहे जरांगे अचानक मराठा आक्रोश के नायक बनकर उभरे हैं। 9 दिनों तक अनशन करने वाले जरांगे को कुछ दिन पहले तक लोग ठीक से जानते तक नहीं थे। महाराष्ट्र का अधिकतर मराठा समुदाय नहीं जानता था कि वह किस गांव के पाटिल हैं।
सौ साल से अधिक पुराना संगठन मराठा महासंघ भी सरकार को आरक्षण के लिए मजबूर नहीं कर सका, लेकिन सामान्य परिवार से आए जरांगे ने किस तरह सरकार को हिला कर रख दिया, यह सवाल लोगों के जेहन में उठ रहा है।
इस तरह बढ़ा सफर
मराठा महासंघ से जुड़े रहे प्रभाकर सूर्यवंशी कहते हैं कि जरांगे मूलरूप से बीड जिले से हैं। उनके घर के हालात अच्छे नहीं थे। खेती भी ज्यादा नही थी। इसलिए शिक्षा भी 12वीं तक ही हुई। जरांगे ने कुछ दिनों तक एक होटल में वेटर रहे। गांव-जवार में होटल के वेटर से लोग किस तरह पेश आते हैं ये समझा जा सकता है, लेकिन मेहनत के बल पर जरांगे लोगों के करीब आए और जिले में युवक कांग्रेस के पदाधिकारी बन गए।
नौवें दिन अनशन खत्म, सरकार को 2 जनवरी तक की मोहलत
मराठा आरक्षण के लिए अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठे शिवबा संगठन के अध्यक्ष मनोज जरांगे पाटिल ने बृहस्पतिवार को 9वें दिन अनशन वापस ले लिया। राज्य सरकार के 4 मंत्रियों के प्रतिनिधिमंडल और दो पूर्व जस्टिस ने मध्यस्थता की। सरकार के प्रतिनिधिमंडल के साथ चली 4 घंटे की बैठक के बाद मनोज जरांगे ने अनशन वापस लेने की घोषणा की। उन्होंने मराठा आरक्षण के लिए राज्य सरकार को 2 जनवरी 2024 तक की मोहलत दी है। जरांगे ने कहा कि सरकार को मिली यह मोहलत आखिरी है। उन्होंने कहा कि न केवल मराठवाड़ा बल्कि पूरे महाराष्ट्र के मराठा समाज को आरक्षण मिले। इसलिए सरकार को 2 जनवरी तक का समय दिया है। इसके बाद सरकार को मौका नही दिया जाएगा।