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मणिपुर हिंसा: 1993 में कांग्रेस ने बर्खास्त की थी अपनी ही सरकार; 2001 में पीएम अटल ने की थी विपक्ष से मुलाकात

सार

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 24 जून को मणिपुर के मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। इस बैठक से पहले कांग्रेस पार्टी की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। कांग्रेस पार्टी ने कहा था कि यह बैठक बहुत देर से हो रही है। अगर मणिपुर के लोगों के साथ बातचीत की कोशिश दिल्ली में बैठकर की जाएगी, तो इसमें गंभीरता नहीं दिखेगी।
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मणिपुर में हिंसा। - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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मणिपुर में 3 मई को शुरू हुई हिंसा कम नहीं हो रही है। राजनेताओं से लेकर आम लोगों के हजारों घरों को जला दिया गया है। लगभग 55 हजार लोग अपने घरों से दूर राहत शिविरों और सुरक्षा बलों के कैंपों में रहने को मजबूर हैं। हिंसा शुरू होने के दो दिन बाद ही जब राज्य में सेना, असम राइफल और सीआरपीएफ ने मोर्चा संभाला तो अपने-अपने क्षेत्रों में मैतेई और कुकी समुदाय के लोगों ने सुरक्षा बलों का रास्ता रोक दिया। विपक्ष इस मामले को लेकर प्रधानमंत्री पर हमलावर है। 

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राहुल गांधी ने कहा था कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश यात्रा पर हैं, तब 24 जून को सर्वदलीय बैठक बुलाई जा रही है। मतलब यह बैठक पीएम के लिए महत्वपूर्ण नहीं थी। 8 अप्रैल 1992 को मणिपुर में कांग्रेस की सरकार बनी थी। राजकुमार दोरेंद्र सिंह मुख्यमंत्री बनाए गए। तब वहां पर हिंसा हो गई। उस वक्त नरसिम्हा राव देश के प्रधानमंत्री थे। उन्होंने अपने मंत्रिमंडल की सलाह पर राज्य में राष्ट्रपति शासन की सिफारिश की। यह नौवां मौका था जब 31 दिसंबर 1993 से 13 दिसंबर 1994 तक 347 दिन तक राष्ट्रपति शासन लगा रहा। 18 जून 2001 को जब मणिपुर में हिंसा शुरु हुई तो उस वक्त अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री थे। विपक्षी दलों ने उनसे मिलने का समय का मांगा। वाजपेयी ने छह दिन के भीतर न केवल विपक्षी दलों से मुलाकात की, बल्कि खुद भी मणिपुर के लोगों से शांति की अपील की। 

विपक्ष ने सर्वदलीय बैठक पर उठाए थे सवाल 
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने 24 जून को मणिपुर के मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाई थी। इस बैठक से पहले कांग्रेस पार्टी की ओर से तीखी प्रतिक्रिया सामने आई। कांग्रेस पार्टी ने कहा था कि यह बैठक बहुत देर से हो रही है। अगर मणिपुर के लोगों के साथ बातचीत की कोशिश दिल्ली में बैठकर की जाएगी, तो इसमें गंभीरता नहीं दिखेगी। राहुल गांधी ने कहा था कि जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश यात्रा पर हैं, तब यह बैठक बुलाई जा रही है। मतलब यह बैठक पीएम के लिए महत्वपूर्ण नहीं थी। 
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कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी बुधवार को एक वीडियो संदेश जारी किया था। इस संदेश में उन्होंने मणिपुर के लोगों से शांति और सद्भाव बनाए रखने की अपील की। सोनिया गांधी ने कहा कि इस हिंसा ने हमारे राष्ट्र की अंतरात्मा पर एक गहरा घाव छोड़ा है। मणिपुर में लोगों का जीवन तबाह कर दिया गया। कांग्रेस पार्टी के वरिष्ठ नेता केसी वेणुगोपाल ने कहा था, सोनिया गांधी के संदेश के बाद केंद्र सरकार जागी है।

मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग 
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि 22 साल पहले 18 जून 2001 को मणिपुर में हिंसा हुई। लोगों के घर और सार्वजनिक संपत्ति को आग के हवाले कर दिया गया। तब अटल बिहारी वाजपेयी देश के प्रधानमंत्री थे। विपक्षी दलों ने वाजपेयी से मिलने का समय मांगा। अटल बिहारी वाजपेयी ने छह दिन बाद ही सर्वदलीय बैठक बुलाई। इतना ही नहीं, उन्होंने मणिपुर के लोगों से शांति की अपील की। 

जयराम रमेश के मुताबिक, इस बार मणिपुर में हो रही हिंसा के मद्देनजर कांग्रेस सहित 10 पार्टियों ने प्रधानमंत्री की विदेश यात्रा शुरु होने से पहले मुलाकात का समय मांगा था। पीएम मोदी ने उन्हें समय नहीं दिया। गृह मंत्री अमित शाह की अध्यक्षता में हुई सर्वदलीय बैठक में कांग्रेस सहित कई विपक्षी दलों ने मुख्यमंत्री एन. बीरेन सिंह को बर्खास्त कर मणिपुर में राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की। इसके साथ ही बिना कोई देरी किए, एक सर्वदलीय शिष्टमंडल मणिपुर भेजा जाए। सर्वदलीय बैठक के बाद कांग्रेस ने कहा, पार्टी के प्रतिनिधि के तौर पर बैठक में पूर्व सीएम ओ इबोबी सिंह को तीन घंटे की बैठक में अपनी बात रखने के लिए केवल सात मिनट दिए गए। बता दें कि इबोबी सिंह 15 साल तक मणिपुर के मुख्यमंत्री रहे हैं। 

कई इलाकों में महिलाएं रोड को बाधित कर रही हैं
सर्वदलीय बैठक में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले दिन से ही मणिपुर की स्थिति पर लगातार नजर बनाए हुए हैं। पूरी संवेदनशीलता के साथ इस समस्या का समाधान ढूंढने के लिए निरंतर हमारा मार्गदर्शन कर रहे हैं। सोमवार को उन्होंने प्रधानमंत्री मोदी से मुलाकात की है। केंद्रीय गृह मंत्री ने पीएम मोदी को मणिपुर की स्थिति से अवगत कराया। 

सूत्रों का कहना है कि 13 जून के बाद वहां हिंसा में किसी के मारे जाने की खबर नहीं है। हालांकि, वहां पर सबसे बड़ी चुनौती बाधित सड़क मार्ग को खुलवाना है। जिस इलाके में जो भी समूह यानी मैतेई या कुकी समुदाय की संख्या ज्यादा है, वहीं पर रोड बंद कर सुरक्षा बलों का रास्ता रोका जा रहा है। गृह मंत्रालय की रिपोर्ट में कहा गया कि राज्य में तीन मई के बाद से लेकर अब तक 131 लोगों की मौत हो चुकी है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह खुद यह बात स्वीकार कर चुके हैं कि कई इलाकों में महिलाएं प्रदर्शन कर रही हैं। वे सड़कों पर खड़ी होकर सुरक्षा बलों को आगे बढ़ने से रोक रही हैं। इस वजह से सुरक्षा बलों का हिंसा ग्रस्त इलाकों में पहुंचना मुश्किल हो रहा है। 

गृह मंत्री समझते हैं कि महिलाओं के खिलाफ कार्रवाई हुई तो मामला और ज्यादा बिगड़ सकता है। 24 जून को सेना ने मणिपुर में विद्रोही समूह केवाईकेएल के 12 कैडरों को पकड़ लिया था। उसके बाद वहां पर बड़ी तादाद में महिलाएं एकत्रित हो गई। नतीजा, 12 कैडरों को छोड़ना पड़ा। 

मणिपुर में महिलाओं के कई समूह हैं
साल 2011 में भी मणिपुर में महिलाओं के समूहों ने राजमार्ग बाधित किया था। उस वक्त कूकी जनजाति के लोगों की मांग थी कि सदर हिल्स को नया जिला बनाया जाए। सरकार ने कुकी समुदाय की मांग को गंभीरता से नहीं लिया। इससे गुस्साए लोगों ने 31 जुलाई को हाइवे रोक दिया। महिलाओं के समूहों ने सड़क पर बैठकर नाकेबंदी कर दी। जब उन्होंने ऐसा किया तो नागा समूह गुस्से में आ गए। चूंकि वे कुकी समुदाय की मांग के खिलाफ थे, इसलिए उन्होंने भी सड़कें बाधित कर दी। इनकी मांग थी कि ऐसे इलाके जो नागा बाहुल्य वाले हैं, उन्हें नए जिले में शामिल नहीं करने देंगे। यूनाइटेड नागा काउंसिल ने 21 अगस्त से हाइवे की नाकाबंदी कर दी। जानकारों के मुताबिक, मणिपुर में इंफाल और हिल क्षेत्र में दशकों से मैतेई और कुकी समुदायों की महिलाओं के बड़े एवं प्रभावी समूह बने हुए हैं।

मणिपुर में कितनी बार लगा है राष्ट्रपति शासन?

  • पहली बार राष्ट्रपति शासन 19 जनवरी 1967 से 19 मार्च 1967 यानी 66 दिन तक लगाया गया था। उस समय मणिपुर केंद्र शासित विधानसभा का पहला चुनाव होना था। 
  • दूसरी बार 25 अक्तूबर 1967 से 18 फरवरी 1968 तक 116 दिन के लिए राष्ट्रपति शासन लगाया गया। तब मणिपुर में राजनीतिक संकट आ गया था। उसके बाद किसी दल के पास स्पष्ट बहुमत नहीं था। 
  • तीसरा बार राज्य में 17 अक्तूबर 1969 से 22 मार्च 1972 तक दो साल 157 दिन के लिए राष्ट्रपति शासन लगा। उस वक्त पूर्ण राज्य के दर्जे की मांग के दौरान हिंसा हुई। कानून व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई थी। 
  • चौथी बार 28 मार्च 1973 से 3 मार्च 1974 तक राष्ट्रपति शासन लगा था। उस वक्त विपक्ष के पास इतना कम बहुमत था कि वह स्थायी सरकार नहीं बना सकता था। 
  • पांचवीं बार 16 मई 1977 से 28 जून 1977 तक 43 दिन के लिए राष्ट्रपति शासन लगा। दलबदल के चलते सरकार गिर गई थी। 
  • छठी बार 14 नवंबर 1979 से 13 जनवरी 1980 तक 60 दिन के लिए राष्ट्रपति शासन लगा। उस वक्त राजनीतिक कारण जिम्मेदार रहे। जनता पार्टी सरकार के साथ असंतोष और भ्रष्टाचार के आरोप सरकार की बर्खास्तगी का कारण बना। विधानसभा भंग कर दी गई। 
  • सातवीं बार 28 फरवरी 1981 से 18 जून 1981 तक राष्ट्रपति शासन लगा। तब भी राजनीतिक कारणों के चलते राज्य में स्थायी सरकार का गठन नहीं हो सका। 
  • आठवीं बार 7 जनवरी 1992 से लेकर 7 अप्रैल 1992 तक 91 दिन के लिए राष्ट्रपति शासन लगा। उस वक्त दलबदल के चलते गठबंधन सरकार गिर गई थी। 
  • नौंवी बार 31 दिसंबर 1993 से 13 दिसंबर 1994 तक 347 दिन तक राष्ट्रपति शासन लगा रहा। तब इसका कारण नगा और कुकी समुदाय के बीच हिंसा हुई थी। वह हिंसा लंबे समय तक चली, जिसमें सैंकड़ों लोग मारे गए थे। 
  • दसवीं बार 2 जून 2001 से 6 मार्च 2002 तक 277 दिन के लिए राष्ट्रपति शासन लगा था। उस वक्त सरकार ने बहुमत खो दिया था।
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