मुंबई की एक विशेष अदालत ने 2008 के मालेगांव विस्फोट मामले में सात आरोपियों को बरी करते हुए कहा कि प्रतिबंधित संगठन स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) की संलिप्तता के बचाव पक्ष के दावे को स्वीकार नहीं किया जा सकता। हालांकि, कोर्ट ने यह जरूर माना कि जांच एजेंसी को इस एंगल की भी जांच करनी चाहिए थी।
विशेष एनआईए जज ए.के. लाहोटी ने अपने 1036 पन्नों के फैसले में कहा कि महाराष्ट्र के आतंक निरोधी दस्ते ने सिमी की संभावित भूमिका की जांच नहीं की, (एटीएस) जिसने पहले इस मामले की जांच की थी। यह फैसला शुक्रवार को सार्वजनिक किया गया।
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आरोपियों ने कोर्ट में कहा था कि विस्फोट उस इमारत के पास हुआ था, जहां सिमी का दफ्तर था और एटीएस को इस बात की जानकारी थी। कोर्ट ने यह माना कि तत्कालीन मुख्य जांच अधिकारी मोहन कुलकर्णी ने अपनी गवाही में यह कबूल किया कि घटनास्थल के पास सिमी का दफ्तर था। उन्हें इसकी जानकारी थी, लेकिन उन्होंने यह जांच नहीं की कि क्या सिमी का दफ्तर उस वक्त भी चालू था या उसके कोई सदस्य वहां मौजूद थे।
कोर्ट ने कहा, जाहिर है कि एटीएस ने इस एंगल से जांच नहीं की कि सिमी की कोई भूमिका नहीं थी। कोर्ट ने यह भी कहा कि एक गवाह के अनुसार विस्फोट से ठीक पहले एक लड़की मोटरसाइकिल के पास खड़ी देखी गई थी। कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि किसी मामले की जांच किस दिशा में की जाए, यह फैसला जांच अधिकारी का अधिकार होता है। लेकिन जब कुछ तथ्य सामने आते हैं, तो उन पर भी ध्यान देना और जांच करना जरूरी होता है।
बचाव पक्ष के वकीलों ने दलील दी थी कि इस धमाके के पीछे सिमी के सदस्य हो सकते हैं। लेकिन कोर्ट ने कहा कि सिमी की संलिप्तता को साबित करने के लिए कोई ठोस सबूत या जांच नहीं हुई, इसलिए इस दावे को स्वीकार नहीं किया जा सकता। गुरुवार को विशेष जज लाहोटी ने सातों आरोपियों को बरी कर दिया था, जिनमें भाजपा सांसद प्रज्ञा सिंह ठाकुर और लेफ्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित शामिल थे। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपियों के खिलाफ शक से परे आरोप सिद्ध करने में नाकाम रहा।
आरोपपत्र में विरोधाभास से सबूतों की शृंखला पूरी नहीं हो पाई
2008 मालेगांव धमाके के मामले में सभी सात आरोपियों को बरी करते हुए विशेष अदालत ने महाराष्ट्र एटीएस और राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) की जांच में गंभीर विरोधाभास उजागर किए हैं। अदालत ने 17 साल पुराने इस मामले में कहा कि दोनों एजेंसियों के आरोपपत्रों में कई महत्वपूर्ण पहलुओं पर भारी अंतर था, जिस कारण सबूतों की शृंखला पूरी नहीं हो पाई।
विशेष एनआईए जज एके लाहोटी ने 1,000 पन्नों से अधिक के फैसले में कहा, एटीएस की जांच के अनुसार धमाके में इस्तेमाल विस्फोटक (आरडीएक्स) पुणे के एक घर में रखा गया था। वहीं एनआईए ने अपनी जांच में बताया कि इंदौर में एक मोटरसाइकिल पर लगाया गया विस्फोटक सेंधवा बस स्टैंड से मालेगांव ले जाया गया था।
अदालत ने यह भी कहा कि दोनों एजेंसियां आरोपियों की संलिप्तता और विस्फोटक के परिवहन जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं पर एकमत नहीं थीं। अदालत ने एटीएस पर लगे आरोपों पर भी गंभीर चिंता व्यक्त की। कई गवाहों और आरोपियों ने आरोप लगाया था कि एटीएस अधिकारियों ने उन्हें यातना दी और अवैध हिरासत में रखा। अदालत ने कहा कि यद्यपि इन आरोपों पर कोई औपचारिक शिकायत दर्ज नहीं की गई थी, लेकिन यह सबूतों की विश्वसनीयता पर संदेह का एक बड़ा कारण है। अदालत ने यह भी ध्यान दिलाया कि इस तरह के आरोप सिर्फ एटीएस अधिकारियों के खिलाफ लगाए गए थे, एनआईए के खिलाफ नहीं।
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29 सितंबर 2008 को मालेगांव में एक मस्जिद के पास हुआ था। 17 साल बाद यह फैसला आया है। मोटरसाइकिल में बंधे विस्फोटक से हुए धमाके में छह लोगों की मौत हुई थी और 101 लोग घायल हुए थे। शुरुआत में इस मामले की जांच महाराष्ट्र एटीएस ने की थी, बाद में यह मामला राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) को सौंप दिया गया था।