ऑक्सीजन को लेकर मचे इस हाहाकार के बीच एक सच्चाई यह है कि केवल 25 लाख रुपये की लागत से एक माध्यम स्तर का अस्पताल (50 से 100 बिस्तर वाले) अपनी पूरी जरूरतभर का ऑक्सीजन स्वयं पैदा कर सकता है। इसके लिए लगभग एक गैराज के जितनी जगह की जरूरत होती है और ऑक्सीजन का यह प्लांट लगाने के केवल एक हफ्ते से दस दिन के अंदर ऑक्सीजन का उत्पादन भी शुरू हो सकता है। यानी चंद दिनों में ऑक्सीजन गैस की किल्लत को हमेशा के लिए समाप्त किया जा सकता है।
यही नहीं, अगर कोई बड़ा अस्पताल चाहे तो केवल 1.87 करोड़ रुपये की लागत से एक बड़े स्तर का ऑक्सीजन प्लांट लगा सकता है। इस प्लांट में रोजाना 600 ऑक्सीजन गैस सिलंडर (11.2 किलोग्राम क्षमता वाले) भर सकने लायक ऑक्सीजन का उत्पादन किया जा सकता है। इतनी भारी मात्रा में ऑक्सीजन की आवश्यकता बड़े-बड़े अस्पतालों तक को नहीं होती।
यानी दो करोड़ रुपये से भी कम की लागत में अस्पताल न सिर्फ अपनी जरूरतें पूरी कर सकता है, बल्कि वह आसपास के दूसरे अन्य अस्पतालों की भी जरूरत पूरी कर सकता है। इसके लिए जगह भी बहुत ज्यादा नहीं चाहिए होती है। केवल 15X15 मीटर की जगह पर्याप्त होती है। इस तरह से उत्पादित ऑक्सीजन को मेडिकल के साथ-साथ औद्योगिक जरूरतों के लिए भी उपयोग किया जा सकता है।
25 लाख रुपये के लगभग की शुरूआती कीमत से लेकर दो करोड़ रुपये तक में लगने वाले इन प्लांट्स को लगाने के लिए कई कंपनियां इस क्षेत्र में काम करती हैं। तकनीकी तौर पर भी इस तरह के प्लांट्स को लगाने की क्षमता हमारे पास है और यह कोई बड़ी चुनौती नहीं है।
अगर कोई राज्य सरकार इस काम को प्रमुखता के साथ करना चाहे तो महीने भर के अंदर वह अपनी पूरी आवश्यकता की ऑक्सीजन पैदा कर सकती है। बड़ी बात यह है कि ऑक्सीजन प्लांट लगाने के लिए पीएम केयर फंड से आर्थिक मदद भी मिल रही है। उत्तर प्रदेश सरकार ने भी ऑक्सीजन प्लांट लगाने के लिए आर्थिक मदद देने की घोषणा की है।
ऑक्सीजन कंसंट्रेटर
किसी मरीज को अगर सीमित मात्रा में ऑक्सीजन गैस की सप्लाई चाहिए होती है, तो उसके लिए ऑक्सीजन कंसंट्रेटर बहुत उचित रहता है। यह फ्रिज के आकार की एक छोटी मशीन होती है जो बिजली से चलती है और वायु से शुद्ध ऑक्सीजन सोखकर मरीज तक पहुंचाती है। लगभग 60 हजार रुपये में आने वाला एक ऑक्सीजन गैस कंसंट्रेटर एक मरीज के लिए लगातार ऑक्सीजन उपलब्ध करा सकता है। हालांकि, इस समय ऑक्सीजन की कमी के कारण इसकी कीमतों में भी दो से तीन गुने तक का उछाल आ गया है।
लेकिन जिन जगहों पर भारी फ्लो वाली ऑक्सीजन की आवश्यकता होती है, वहां यह बहुत उपयोगी साबित नहीं होता है। हालांकि, बड़े ऑक्सीजन कंसंट्रेटर भी आते हैं जो ज्यादा मात्रा में ऑक्सीजन उपलब्ध करा सकते हैं, लेकिन इनकी कीमत काफी अधिक होती है।
सोचा ही नहीं था ये खतरा
दरअसल, ऑक्सीजन गैस की मची अफरा-तफरी के पीछे ऑक्सीजन गैस की उपलब्धता की कमी नहीं है। बल्कि इसकी असली वजह यह है कि हमारी सरकारें हों या हमारे अस्पताल इस परिस्थिति से निपटने के लिए तैयार ही नहीं थे। अगर ऑक्सीजन जैसी बेहद आवश्यक चीज के लिए हमारी सरकारों ने बड़े अस्पतालों के ऊपर उत्पादन करने संबंधी नियम लागू किया होता तो आज यह स्थिति पैदा ही नहीं होती।
क्यों मची अफरा-तफरी
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (Indian Medical Association) के पूर्व अध्यक्ष विनय अग्रवाल ने अमर उजाला से कहा कि दरअसल, एक हफ्ते पहले तक ऑक्सीजन की सप्लाई कोई मुद्दा ही नहीं हुआ करती थी। भारत प्रतिदिन लगभग 7500 मीट्रिक टन ऑक्सीजन गैस का उत्पादन करता है। मेडिकल उपयोग के लिए इसकी आधी क्षमता का भी उपयोग नहीं होता है। इस समय बढ़ी मांग के कारण लगभग 6600 मीट्रिक टन ऑक्सीजन मेडिकल क्षेत्र को देने की घोषणा कर दी गई है। आवश्यकता से अधिक उत्पादन के कारण देश न सिर्फ उद्योगों को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन उपलब्ध कराता था, बल्कि इसका एक्सपोर्ट भी करता था।
ऑक्सीजन गैस के सप्लायर भी बड़े अस्पतालों में अपनी कंपनी की तरफ से ज्यादा से ज्यादा गैस सप्लाई करने के लिए अस्पतालों को मनाने में जुटे रहते थे। लेकिन कोरोना मामलों में हुए भयानक विस्फोट ने अचानक देश में ऑक्सीजन की मांग में तीन-चार से दस गुना तक की वृद्धि कर दी है। अचानक बढ़ी इस भारी मांग को पूरा करने में उद्योग समर्थ नहीं हैं। ऑक्सीजन गैस के ट्रांसपोर्टेशन के लिए पर्याप्त क्रायोजेनिक टैंकर न होना भी बड़ी समस्या बन गई है।
अस्पतालों को सोचने का मौका
हॉस्पिटल बोर्ड ऑफ इंडिया के पूर्व चेयरमैन डॉक्टर वीके मोंगा ने कहा कि अस्पतालों के सामने यह एक नई चुनौती है। अब तक हमारे अस्पतालों ने कभी इस तरह की स्थिति का सामना ही नहीं किया था। लेकिन इस स्थिति ने उन्हें यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि क्या उन्हें अपना ऑक्सीजन गैस प्लांट स्थापित करना चाहिए। आने वाले समय में अस्पताल अपना ऑक्सीजन गैस प्लांट्स लगाने पर भी विचार करेंगे। विशेषकर बड़े और भारी-भरकम बजट वाले या पांच सितारा अस्पताल अपने मरीजों के लिए यह निवेश कर सकते हैं।
हर चीज का उत्पादन करना संभव नहीं
फोर्टिस मेमोरियल रिसर्च इंस्टिट्यूट, गुरुग्राम के निदेशक डॉक्टर प्रवीण गुप्ता ने कहा कि अस्पताल हों या कोई भी अन्य क्षेत्र, किसी के लिए भी अपनी जरूरत की हर चीज का उत्पादन संभव नहीं है। कई चीजों के लिए सभी क्षेत्रों को बाहरी स्रोतों या आउटसोर्सिंग पर निर्भर रहना पड़ता है। ऑक्सीजन गैस इन्हीं चीजों में से एक है। अचानक बढ़ी मांग के कारण कुछ दिनों के लिए यह आपात स्थिति पैदा हो गई है, लेकिन यह हमेशा के लिए नहीं रहने वाली है। हालांकि, वे इस बात से सहमत हैं कि जिन अस्पतालों के पास पर्याप्त जगह है, वे अपने यहां ऑक्सीजन प्लांट अवश्य लगा सकते हैं।
दिल्ली मेडिकल एसोसिएशन के शीर्ष पदाधिकारी गिरीश त्यागी ने कहा कि दिल्ली जैसे क्षेत्रों में बेहद छोटी-छोटी जगहों पर अस्पताल या नर्सिंग होम चलते हैं। उनके स्तर पर इस तरह के प्लांट्स लगाना संभव नहीं है। उनके पास इसकी ऑक्सीजन की लगातार भारी उपयोगिता भी नहीं रहती है। लेकिन सरकार के बड़े-बड़े अस्पतालों में जहां जगह की समस्या नहीं है, वहां इन्हें स्थापित किया जा सकता है। राज्य सरकारों को इसकी तरफ ध्यान देना चाहिए।