फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कोरोना से जंग: मई के तीसरे हफ्ते से बेहतर होने लगेंगे हालात, वैक्सीन की पहली डोज भी बचा सकती है जान

Thu, 22 Apr 2021 04:11 PM IST
Harendra Chaudhary आशीष तिवारी, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

इंडियन एसोसिएशन ऑफ मेडिकल माइक्रोबायोलॉजिस्ट के पूर्व प्रेसिडेंट प्रोफेसर अरुणलोक चक्रवर्ती के अनुमान के मुताबिक पहली वैक्सीन की डोज लगने के साथ ही बनने लगेंगी एंटीबॉडी और खत्म होगा कोरोना का खौफ...
विज्ञापन
प्रो अरुणलोक चक्रवर्ती - फोटो : Amar Ujala
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

अगर सब कुछ सामान्य रहा और योजनाबद्ध तरीके से व्यवस्थाओं को अमल में लाया गया तो मई के तीसरे सप्ताह के बाद देश में कोविड के मामले कम होने लगेंगे। ऐसा किसी जादू की छड़ी से नहीं बल्कि देश में होने वाले वृहद टीकाकरण अभियान से होने वाला है। दरअसल कोविड की रोकथाम के लिए टीकाकरण ही एक मात्र उपाय है। रिसर्च बताती हैं कि वैक्सीन की पहली डोज लेने के तीसरे सप्ताह से एंटीबॉडी बनने लगती हैं। जो कोविड जैसी महामारी में मरीजों को बहुत लाभप्रद हैं। इंडियन एसोसिएशन ऑफ मेडिकल माइक्रोबायोलॉजिस्ट के पूर्व प्रेसिडेंट और चंडीगढ़ पीजीआई के माइक्रोबायोलॉजी विभाग के प्रमुख प्रोफेसर अरुणलोक चक्रवर्ती से अमर उजाला डॉट कॉम की खास बातचीत...

विज्ञापन

प्रोफेसर चक्रवर्ती ने बताया कि देश में जिस तरीके से कोविड को लेकर हाहाकार मचा हुआ है वह मई के तीसरे हफ्ते के बाद से थमना शुरू हो जाएगा। उनका कहना है मेडिकल साइंस की रिसर्च के मुताबिक इस बीमारी से बचाव के लिए वैक्सीनेशन ही एक कारगर तरीका है। प्रोफेसर चक्रवर्ती कहते हैं कि एक मई से देशभर में वृहद टीकाकरण अभियान शुरू होने जा रहा है। वह इस बीमारी की रोकथाम के लिए बहुत बड़ा कारक बनने वाला है। उनके मुताबिक किसी भी वैक्सीनेशन को जांचने का सबसे बेहतर तरीका उसकी क्षमता होती है। उसकी क्षमता को कम से कम डेढ़ से दो साल के वक्त में ही जांचा जा सकता है। क्योंकि आपातकालीन व्यवस्था के तहत देशभर में और दुनिया भर में वैक्सीनेशन प्रोग्राम तैयार किया गया। इस प्रोग्राम के तहत वैक्सीन की दक्षता और सुरक्षा दोनों को ध्यान में रखकर टीकाकरण अभियान शुरू किया जा चुका है।

प्रोफेसर चक्रवर्ती का कहना है कि किसी भी व्यक्ति के वैक्सीन लेने के बाद हमारे शरीर में तीन सप्ताह के भीतर एंटीबॉडीज बनने लगती हैं। एंटीबॉडी वायरस से न सिर्फ लड़ने में सहायक होती हैं बल्कि बीमारी की चपेट में आने वाले मरीज की जान भी बहुत हद तक बचाती हैं। यही वजह है कि जिन मरीजों ने वैक्सीन की पहली डोज भी ले ली, उन्हें जान का खतरा उतना नहीं रहा। प्रोफेसर चक्रवर्ती के मुताबिक मेडिकल साइंस की रिसर्च बताती है कि किसी भी बड़े टीकाकरण अभियान से न सिर्फ मृत्यु दर रोकी जाती है बल्कि उसके संक्रमण के प्रसार को भी बहुत हद तक कंट्रोल किया जाता है। यही वजह है कि इस टीकाकरण अभियान से देश को कोरोना जैसी बीमारी से लड़ने में बहुत मदद मिलेगी।
विज्ञापन

प्रोफेसर चक्रवर्ती ने बताया कि अमेरिका में 7.70 करोड़ लोगों को वैक्सीन लगाई जा चुकी है। अमेरिकन जर्नल ऑफ मेडिकल माइक्रोबायोलॉजी और अमेरिकी स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के मुताबिक अमेरिका में वैक्सीन लगवाने वालों में से 5800 लोगों को दोबारा कोरोना हुआ। जर्नल और विभाग में दी हुई पूरी डिटेल के मुताबिक इनमें से महज 74 लोगों की मौत हुई। प्रोफेसर चक्रवर्ती का कहना है कि अगर इन आंकड़ों पर गौर करें तो एक बात स्पष्ट हो जाती है कि पहली डोज ही मरीज की जान बचाने में सक्षम है। हालांकि उनका कहना है कोविड से बचाव के लिए जो सरकार के प्रोटोकॉल हैं उनका पालन करना बेहद जरूरी है।

प्रोफेसर चक्रवर्ती बताते हैं कि ज्यादातर वायरस म्यूटेट होकर अपनी सक्रियता खत्म कर देते हैं या शरीर के बनने वाली एंटीबॉडी के साथ में निष्क्रिय हो जाते हैं। हालांकि कोविड-19 के इस वैरिएंट में ऐसा नहीं हो रहा है। यह वायरस म्यूटेट होकर और ज्यादा ताकतवर हुआ और लोगों के लिए मुसीबत का सबब बन रहा है। इससे निपटने के लिए सिर्फ और सिर्फ वैक्सीनेशन ही एक रास्ता है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें