सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर ऋण वसूली को लेकर सरकार की नीति सही होती तो इतने बड़े पैमाने पर ऋण एनपीए नहीं बनता। शीर्ष अदालत ने सरकार से कहा कि बैंकिंग सिस्टम में बदलाव करने के लिए कहा है जिससे कि बड़े पैमाने पर ऋण माफी और बेड लोन पर लगाम लगाई जा सके।
चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस पूरे सिस्टम को गंभीरता से विचार करने की जरूरत है क्योंकि बड़े पैमाने पर लोग और कंपनियां ऐसा कर रही है। पीठ ने कहा कि यह कहना गलत होगा कि हालिया सिस्टम सही है।
अगर सिस्टम या नीति सही होती तो इतने बड़े पैमाने पर ऋण को माफ नहीं किया जाता। मंगलवार को याचिकाकर्ता संगठन की ओर से पेश वकील प्रशांत भूषण ने पीठ ने गुहार लगाई की अदालत को सरकार को इससे संबंधित कारगर नीति बनाने का निर्देश दिया जाए।
इस पर पीठ ने सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार से यह जानना चाहा कि इस संबंध में सरकार क्या कर रही है। पीठ ने कहा कि चूंकि इस मुद्दे को लेकर हम विशेषज्ञ नहीं है लेकिन आप है। पीठ ने कहा कि सरकार को ऐसा दिशानिर्देश बनाना चाहिए जिससे कि मनमाने तरीके से ऋण वितरित न किया जा सके और ऋण की वसूली संभव हो।
जवाब में सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि सरकार की ओर से इस संबंध में प्रयास जारी है। उन्होंने बताया कि दिवालिया कोड जल्द ही अस्तित्व में आ जाएगा। सरकार इस पर काम कर रही है।
इसके बाद पीठ ने आरबीआई और बैंकों की ओर से पेश वकीलों को भी यह बताने के लिए कहा कि इस समस्या केसमाधान केलिए क्या-क्या प्रयास किए जा सकते हैं। पीठ ने कहा कि हम इस संबंध में एक कमेटी का भी गठन कर सकते हैं, तो सरकार को समाधान निकालने में मदद करेगी। अगली सुनवाई जुलाई में होगी।