दलित नेता ब्रिटिश फ़ौज की इस जीत का जश्न इसलिए मनाते हैं क्योंकि ऐसा माना जाता है कि जीतने वाली ईस्ट इंडिया कंपनी से जुड़ी टुकड़ी में ज़्यादातर महार समुदाय के लोग थे, जिन्हें अछूत माना जाता था। इसे कोरेगांव की लड़ाई भी कहा जाता है। जानकार बताते हैं कि पेशवा बाजीराव द्वितीय की अगुवाई में 28 हजार मराठा पुणे पर हमला करने की योजना बना रहे थे।
रास्ते में उन्हें 800 सैनिकों से सजी कंपनी फोर्स मिली, जो पुणे में ब्रिटिश सैनिकों की ताक़त बढ़ाने के लिए जा रही थी। पेशवा ने कोरेगांव में मौजूद कंपनी फ़ोर्स पर हमला करने के लिए अपने 2 हजार सैनिक भेजे। कप्तान फ्रांसिस स्टॉन्टन की अगुवाई में ईस्ट इंडिया कंपनी की इस टुकड़ी ने क़रीब 12 घंटे तक अपनी पोजीशन संभाले रखी और मराठों को कामयाब नहीं होने दिया। बाद में मराठों ने फैसला बदला और कदम खींच लिए।
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क्योंकि उन्हें इस बात का डर था कि जनरल जोसफ़ स्मिथ की अगुवाई में बड़ी ब्रिटिश टुकड़ी वहां पहुंच जाएगी जिससे मुकाबला आसान नहीं होगा। इस टुकड़ी में भारतीय मूल के जो फौजी थे, उनमें ज़्यादातर महार दलित थे और वो बॉम्बे नेटिव इनफ़ैंट्री से ताल्लुक रखते थे। ऐसे में दलित कार्यकर्ता इस घटना को दलित इतिहास का अहम हिस्सा मानते हैं।
मराठों को टक्कर
जेम्स ग्रांट डफ ने अपनी किताब 'ए हिस्टरी ऑफ द मराठाज' में इस लड़ाई का ज़िक्र किया है। इसमें लिखा है कि रात भर चलने के बाद नए साल की सुबह दस बजे भीमा के किनारे पहुंचे जहां उन्होंने करीब 25 हजार मराठों को रोके रखा।
वो नदी की तरफ मार्च करते रहे और पेशवा के सैनिकों को लगा कि वो पार करना चाहते हैं लेकिन जैसे ही उन्होंने गांव के आसपास का हिस्सा कब्ज़ाया, उसे पोस्ट में तब्दील कर दिया। हेनरी टी प्रिंसेप की किताब हिस्टरी ऑफ़ द पॉलिटिकल एंड मिलिट्री ट्रांजैक्शंस इन इंडिया में इस लड़ाई में महार दलितों से सजी अंग्रेज़ टुकड़ी के साहस का ज़िक्र मिलता है।
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इस किताब में लिखा है कि कप्तान स्टॉन्टन की अगुवाई में जब ये टुकड़ी पूना जा रही थी, तो उस पर हमला होने की आशंका थी। खुली जगह पर फंसने के डर से बचने के लिए इस टुकड़ी ने कोरेगांव में पहुंचकर उसे अपना किला बनाने का फैसला किया। अगर ये टुकड़ी खुले में फंस जाती तो मराठों के हाथों बुरे हालात में फंस सकती थी।
अलग-अलग इतिहासकारों के मुताबिक इस लड़ाई में 834 कंपनी फौजियों में से 275 मारे गए, घायल हुए या फिर लापता हो गए। इनमें दो अफसर भी शामिल थे। इंफ़ैंट्री के 50 लोग मारे गए और 105 जख़्मी हुए। ब्रिटिश अनुमानों के मुताबिक पेशवा के 500-600 सैनिक इस लड़ाई में मारे गए या घायल हुए।