महाराष्ट्र विधानसभा का जनादेश सभी दलों को उलझाने वाला है। सरकार बनाने केलिए या तो एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना को साथ आना होगा या फिर भाजपा को इनमें से किसी एक दल का साथ या इन दलों के दो तिहाई विधायकों का समर्थन हासिल करना होगा। चूंकि विधायक दल की बैठक के जरिये पवार ने अपने नब्बे फीसदी विधायकों को साधने का साफ संदेश दे दिया है, इससे सियासी बाजी फिर से उलझती दिख रही है।
पीएम से अब तक नहीं हुई चूक
पीएम ने जिस प्रकार सबसे पहले फडणवीस और अजित पवार को बधाई दी है उसमें भी कई संकेत छिपे हैं। पीएम ने अब तक स्थिति पूरी तरह साफ नहीं होने पर किसी सीएम या सरकार को बधाई नहीं दी है। मसलन कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जब बीएस येदियुरप्पा की अगुवाई में सरकार बनी तो पीएम न तो शपथ में शामिल हुए और न ही कोई बधाई संदेश भेजा।
जबकि इसी सूबे में जब कांग्रेस-जेडीएस के विधायकों के टूटने के बाद येदियुरप्पा सरकार बनी तो बधाई देने वालों में पीएम सबसे आगे थे। ठीक इसी तरह मध्यप्रदेश विधानसभा चुनाव में बहुमत से मामूली अंतर से चूकी भाजपा का जब सरकार बनाने की कोशिश की चर्चा हो रही थी, तब अचानक पीएम ने कांग्रेस के नेतृत्व में बनने वाली नई सरकार को बधाई दे दी थी। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि पीएम का फडणवीस को बधाई संदेश बिना पुख्ता तैयारियों के नहीं दिया गया है।
बहुमत कुछ सुप्रीम कोर्ट के रुख से होगा तय
मामले की सुनवाई रविवार को सुप्रीम कोर्ट में होगी। शीर्ष अदालत के रुख से सूबे की राजनीति में नई हलचल पैदा हो सकती है। माना जा रहा है कि बहुत राहत देने के बाद भी शीर्ष अदालत नई सरकार को बहुमत साबित करने के लिए ज्यादा समय नहीं देगा। जाहिर तौर पर अगर फडणवीस सरकार को कम समय मिला तो भाजपा को सियासी बिसात सजाने में मुश्किल होगी।