महाराष्ट्र के वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम में देवेंद्र फडणवीस राजनीति के बड़े खिलाड़ी बनकर उभरे हैं। पिछले दस दिन के बीच उन्होंने सत्तारूढ़ उद्धव ठाकरे सरकार को तीसरी बार बड़ा झटका दिया है। पहले राज्यसभा चुनाव में उन्होंने क्रॉस वोटिंग करवाकर पार्टी के एक अतिरिक्त उम्मीदवार को जिताने में सफलता पाई, तो दूसरी बार सोमवार को हुए एमएलसी चुनाव में भी अपने एक अतिरिक्त उम्मीदवार को जीत दिलाकर सरकार को पटखनी दी। अब पूरी सरकार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। इस सियासी घटनाक्रम ने फडणवीस का कद बढ़ा दिया है।
देवेंद्र फडणवीस की इस 'उपलब्धि' का महत्व इस अर्थ में और भी ज्यादा बढ़ जाता है कि इस घटनाक्रम के लिए उन्हें पार्टी के शीर्ष नेतृत्व से कोई सहयोग नहीं मिला। किसी भी राज्य में सियासी उलटफेर करने में माहिर अमित शाह ने भी इस मुद्दे पर फडणवीस का कोई साथ नहीं दिया और उन्हें इसे अपने स्तर पर ही 'देखने' की बात कह दी। एक दिन पूर्व फडणवीस के दिल्ली पहुंचने पर भी उन्हें इस मामले में तभी आगे बढ़ने की नसीहत दी गई, जब सारे पत्ते अपने हाथ में हों। फडणवीस ने खुद ही इसकी योजना बनाई और इस अंजाम तक पहुंचाया। यही कारण है कि इस घटनाक्रम के सूत्रधार के रूप में फडणवीस की अहमियत और ज्यादा बढ़ गई है।
दरअसल, माना जा रहा है कि अपनी सरकार गिरने के बाद से ही देवेंद्र फडणवीस ने इस योजना पर काम करना शुरू कर दिया था। बिना शोर किये उन्होंने शिवसेना के बीच उस पॉइंट को खोजने की कोशिश की, जो उन्होंने शिवसेना के किले में सेंध लगाने के लिए रास्ता तैयार कर सकता था। उनकी यह तलाश एकनाथ शिंदे ने पूरी की, जो उनकी सरकार में मंत्री भी रह चुके हैं। भाजपा-शिवसेना सरकार में भी एकनाथ शिंदे अहम मंत्रालय संभाल रहे थे और दोनों दलों में आपसी समन्वय स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे थे।
देवेंद्र फडणवीस ने एकनाथ शिंदे को उसी समय से अपना करीबी बनाना शुरू कर दिया था, जब ठाणे की राजनीति में आनंद दिघे की एक सड़क दुर्घटना में मौत के बाद शिंदे ने अपना राजनीतिक कद बढ़ाना शुरू कर दिया था। कहा जाता है कि फडणवीस के एकनाथ से करीबी रिश्तों के कारण ही भाजपा ठाणे नगर निगम के चुनाव में पीछे हट गई थी। एकनाथ शिंदे ने इसे अपने राजनीतिक कद को बढ़ाने में बेहद महत्वपूर्ण माना था। बाद में फडणवीस मंत्रिमंडल में काम करते हुए ये संबंध और ज्यादा मजबूत होते चले गए। अब फडणवीस ने उन्हीं रिश्तों को ठाकरे सरकार को कमजोर करने में इस्तेमाल कर लिया।
20 जून को हुए एमएलसी चुनाव में ही शिवसेना में दरार पड़ने का प्रमाण मिल गया था, जब शिवसेना के दो उम्मीदवारों को केवल 52 वोट मिले जबकि उसके पास 55 विधायक हैं। यानी कम से कम तीन शिवसेना विधायकों ने क्रॉस वोटिंग की थी। वहीं, देवेंद्र फडणवीस के नेतृत्व में भाजपा ने कम विधायक होने के बाद भी अपने पांच उम्मीदवारों को जीत हासिल कराने में सफलता पाई। फडणवीस का यह दांव एकनाथ शिंदे के सहारे ही खेला गया था।
राज्यसभा सांसदों के चुनाव में भी देवेंद्र फडणवीस ने अपनी राजनीतिक कुशलता का परिचय दिया था। भाजपा के पास केवल दो सांसदों को जिताने का गणित होने के बाद भी उन्होंने पार्टी के तीसरे उम्मीदवार धनंजय महाडिक को जिताने में सफलता पाई थी। तीसरे उम्मीदवार के लिए छोटे दलों और कुछ स्वतंत्र विधायकों को भाजपा खेमे में लाकर उन्होंने सत्तारूढ़ शिवसेना को जबरदस्त झटका दिया था। फडणवीस की इस राजनीति से सीधे उद्धव ठाकरे को नुकसान पहुंचा था, क्योंकि शिवसेना के तीसरे उम्मीदवार संजय पवार की क्रॉस वोटिंग के कारण हार हो गई थी।