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Maharashtra: कुणाल कामरा की किस याचिका पर बॉम्बे HC ने केंद्र से मांगा जवाब? 14 अगस्त को होगी अगली सुनवाई

Thu, 16 Jul 2026 12:41 PM IST
Pavan अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

सार

कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई के लिए 14 अगस्त की दोपहर 3 बजे का समय तय किया है। इसके साथ ही अदालत ने कुणाल कामरा को भी अपनी बात रखने की छूट दी है। कोर्ट ने कहा है कि केंद्र सरकार 29 जुलाई तक जो भी जवाब दाखिल करेगी, कामरा उस पर 6 अगस्त तक अपना काउंटर रिप्लाई कोर्ट के सामने रख सकते हैं।
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बॉम्बे हाई कोर्ट - फोटो : ANI
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विस्तार
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बॉम्बे हाई कोर्ट ने बुधवार को केंद्र सरकार को आदेश दिया है कि वह मशहूर स्टैंड-अप कॉमेडियन कुणाल कामरा की याचिका पर 29 जुलाई तक अपना जवाब कोर्ट में पेश करे। कुणाल कामरा ने इस साल की शुरुआत में हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था और सरकार के 'सहयोग पोर्टल' के साथ-साथ आईटी नियम 2021 (सूचना प्रौद्योगिकी नियम) में साल 2025 में किए गए बदलावों को चुनौती दी थी। कामरा का साफ कहना है कि सरकार के ये नए नियम पूरी तरह से असंवैधानिक हैं। उन्होंने अपनी याचिका में दावा किया है कि इन नए बदलावों के आने के बाद सरकार को यह पावर मिल जाएगी कि वह बिना किसी ठोस कानूनी प्रक्रिया या सुरक्षा के, इंटरनेट और सोशल मीडिया से किसी भी पोस्ट या कंटेंट को हटा सके।
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इस मामले की सुनवाई कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश रवींद्र घुगे और न्यायमूर्ति गौतम अंखाड की बेंच कर रही है। कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई के लिए 14 अगस्त की दोपहर 3 बजे का समय तय किया है। इसके साथ ही अदालत ने कुणाल कामरा को भी अपनी बात रखने की छूट दी है। कोर्ट ने कहा है कि केंद्र सरकार 29 जुलाई तक जो भी जवाब दाखिल करेगी, कामरा उस पर 6 अगस्त तक अपना काउंटर रिप्लाई कोर्ट के सामने रख सकते हैं।

कोर्ट में सुनवाई के दौरान कुणाल कामरा की तरफ से देश के जाने-माने वरिष्ठ वकील नवरोज सीरवाई पेश हुए। उन्होंने बेंच के सामने दलील दी कि केंद्र सरकार को इस मामले में पक्ष रखने के लिए पहले भी कई मौके दिए जा चुके हैं, लेकिन सरकार ने अब तक इस मुद्दे पर अपना आधिकारिक हलफनामा दाखिल नहीं किया है। वकील सीरवाई ने जोर देकर कहा कि यह मामला देश के हर नागरिक के लिए बहुत संवेदनशील है क्योंकि इसका सीधा संबंध हमारे संविधान के आर्टिकल 19(1)(ए) से है।
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उन्होंने याद दिलाया कि देश के नागरिकों को अपनी बात कहने और लिखने की जो आजादी मिली है, यानी जो फ्रीडम ऑफ स्पीच है, उसे लेकर सुप्रीम कोर्ट दशकों से कड़े और ऐतिहासिक फैसले देती आई है। यह आजादी नागरिकों के सबसे बड़े अधिकारों में से एक है और इतने बड़े संवैधानिक मसले पर भी केंद्र सरकार का अब तक कोई जवाब न देना सच में चिंता का विषय है। दूसरी तरफ, केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अनिल सिंह ने कोर्ट से कहा कि सरकार को अपनी बात तैयार करने के लिए अगस्त तक का समय चाहिए। हालांकि, कामरा के वकील ने इसका कड़ा विरोध किया। आखिरकार, दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाई कोर्ट ने बीच का रास्ता निकाला और केंद्र सरकार को जवाब देने के लिए 29 जुलाई तक की आखिरी मोहलत दे दी।

अगर कुणाल कामरा की याचिका को समझें, तो उन्होंने मुख्य रूप से सरकार के उन नए नियमों को घेरा है जिनके तहत फेसबुक, एक्स (ट्विटर) और इंस्टाग्राम जैसी सोशल मीडिया कंपनियों पर डाली गई किसी भी पोस्ट को ब्लॉक करने या इंटरनेट से पूरी तरह हटाने का रास्ता साफ किया गया है। याचिका में सरकार पर सीधा आरोप लगाया गया है कि यह नई व्यवस्था सोशल मीडिया से कंटेंट को गायब करने के लिए एक अलग और समानांतर सिस्टम खड़ी कर रही है। यह नया सिस्टम पुराने आईटी एक्ट, 2000 की धारा 69ए के तहत तय किए गए कानूनी नियमों और सुरक्षा मानकों को पूरी तरह से नजरअंदाज करता है। याचिका में यह भी कहा गया है कि सरकार के नए 'सहयोग पोर्टल' की मदद से किसी भी इंटरनेट यूजर को बिना कोई पूर्व सूचना दिए या बिना बताए उसकी पोस्ट को इंटरनेट से सीधे हटाया जा सकता है, जो कि न्याय के बुनियादी सिद्धांतों और संविधान से मिली बोलने की आजादी के पूरी तरह खिलाफ है।

याचिका में इस बात का भी हवाला दिया गया है कि सरकार के ये नए नियम साल 2015 के उस मशहूर 'श्रेया सिंघल मामले' का भी उल्लंघन करते हैं, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने इंटरनेट पर अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था। इसके अलावा, कामरा ने अपनी याचिका में इस बात का भी कड़ा विरोध किया है कि नए नियमों के तहत अब राज्य सरकारों और उनके अलग-अलग विभागों को भी इंटरनेट पर किसी भी सामग्री को ब्लॉक करने का अधिकार दिया जा रहा है। उनका कहना है कि हमारे देश के संविधान के नियमों के मुताबिक, इंटरनेट पर किसी चीज को रोकने या ब्लॉक करने जैसे बड़े और संवेदनशील अधिकार सिर्फ और सिर्फ केंद्र सरकार के पास ही हो सकते हैं, राज्यों के पास नहीं।
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