उच्चतम न्यायालय में महाराष्ट्र सरकार ने मंगलवार को कहा कि निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार के रुप में केवल संसद ही शामिल कर सकती है, अदालत ऐसा नहीं कर सकती। न्यायमूर्ति जे एस खेहर की अध्यक्षता वाली नौ सदस्यीय संविधान पीठ के समक्ष महाराष्ट्र सरकार की तरफ से वरिष्ठ अधिवक्ता सी ए सुन्दरम ने यह दलील पेश की।
संविधान की यह पीठ इस सवाल पर विचार कर रही है कि निजता का अधिकार मौलिक अधिकार है या नहीं। न्यायमूर्ति खेहर के अलावा इस पीठ में न्यायमूर्ति जे चेलामेश्वर, न्यायमूर्ति एस ए बोबडे, न्यायमूर्ति आर के अग्रवाल, न्यायमूर्ति रोहिन्टन फली नरिमन, न्यायमूर्ति अभय सप्रे, न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति संजय किशन कौल और एस अब्दुल नजीर शामिल हैं।
सुन्दरम ने कहा कि यह संविधान या कानून की व्याख्या का मामला नहीं है। यह किसी अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में शामिल करने का मामला है। यह सिर्फ संसद द्वारा ही किया जा सकता है। उन्होंने कहा कि निजता एक परिभाषित शब्द नहीं है और इसे संविधान के तहत एक अलग मौलिक अधिकार का दर्जा नहीं दिया जा सकता है।
महाराष्ट्र सरकार के अलावा मध्य प्रदेश सरकार ने भी निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार के रूप में शामिल करने की वकीलों की दलीलों का विरोध किया है। मध्य प्रदेश सरकार की तरफ से अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आयकर कानून, सूचना का अधिकार कानून और भारतीय टेलिग्राफ कानून सहित विभिन्न कानूनों का जिक्र करते हुए कहा कि इन तमाम कानूनों में निजता के अनेक पहलुओं की रक्षा की गई है। उन्होंने कहा कि चूंकि अनेक कानूनों में निजता के पहलू को संरक्षित किया गया है। इसलिए ऐसी स्थिति में इसे मौलिक अधिकारों की श्रेणी में रखने की आवश्यकता नहीं है।