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महाराष्ट्र ही नहीं सरकार बनाने के ये मामले भी पहुंचे सुप्रीम कोर्ट, जानिए 30 साल का सफर

Sun, 24 Nov 2019 09:32 PM IST
आसिम खान न्यूज डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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महाराष्ट्र की राजनीति - फोटो : अमर उजाला
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महाराष्ट्र में अजित पवार ने शनिवार को भाजपा के साथ मिलकर महाराष्ट्र में सरकार बना ली। देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री तो अजित पवार ने उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। महाराष्ट्र के राज्यपाल के फैसले के खिलाफ एनसीपी-शिवसेना और कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 

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एनसीपी-शिवसेना और कांग्रेस की याचिका पर आज सुप्रीम कोर्ट ने रविवार को सुनवाई की। ये सरकार बनाने का पहला मामला नहीं है जो सुप्रीम कोर्ट पहुंचा है। इस से पहले भी सरकार बनाने को लेकर राजनीतिक पार्टियां सुप्रीम कोर्ट का रुख कर चुकी हैं। 

सुप्रीम कोर्ट में महाराष्ट्र की 'महाभारत'

एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार के भतीजे अजित पवार ने शनिवार को भाजपा के साथ मिलकर महाराष्ट्र में सरकार बना ली। देवेंद्र फडणवीस ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली थी जबकि अजित पवार को उप मुख्यमंत्री बनाया गया। जिसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया। 

महा विकास अघाड़ी (एनसीपी-शिवसेना और कांग्रेस गठबंधन) की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने अदालत में कहा कि यदि भाजपा के पास बहुमत है तो वह आज ही बहुमत परीक्षण कराए। भाजपा, कांग्रेस-एनसीपी और शिवसेना की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने सभी पक्षों को नोटिस जारी कर दिया। सोमवार सुबह साढ़े दस बजे फिर से सुनवाई होगी। 

2018 में कांग्रेस-जेडीएस पहुंचे सुप्रीम कोर्ट

2018 में कांग्रेस-जेडीएस सरकार गिरने के बाद राज्यपाल वजूभाई वाला ने भाजपा को सरकार बनाने का न्यौता दिया। भाजपा नेता बीएस येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। कांग्रेस और जेडीएस ने इसका विरोध किया और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। 

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18 मई 2018 को सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए 19 मई शाम चार बजे यानी 24 घंटों के भीतर बहुमत साबित करने का आदेश दिया। बीएस येदुरप्पा सरकार ने फ्लोर टेस्ट पास कर लिया।

2017 में परिकर के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची कांग्रेस

2017 में गोवा में मनोहर परिकर को सीएम बनाने के खिलाफ कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शपथ ग्रहण पर रोक लगाने से इंकार करते हुए 16 मार्च को फ्लोर टेस्ट करवाने का आदेश दिया।

2016 में केंद्र के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
केंद्र सरकार ने 24 जनवरी 2016 को राष्ट्रपति शासन की सिफारिश की। जिसके बाद ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। जुलाई 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने अरुणाचल प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लागू करने के केंद्र के फैसले को पलट दिया। अरुणाचल प्रदेश में राजनीतिक गतिरोध का हवाला देते हुए केंद्र सरकार ने 24 जनवरी 2016 को वहां राष्ट्रपति शासन की सिफारिश की थी।

2016 में उत्तराखंड मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

उत्तराखंड में हरीश रावत सरकार के पास बहुमत नहीं होने की बात कहते हुए राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। कांग्रेस के नौ विधायकों की बगावत के बाद मुश्किलों में घिरी हरीश रावत सरकार को 28 मार्च को बहुमत साबित करना था। 

लेकिन इससे पहले राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। मई 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन हटाते हुए हरीश रावत की सरकार फिर से बहाल कर दिया।

2005 में बिहार मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट

जनता दल यूनाइडेट (जेडीयू) के नेता नीतीश कुमार सरकार बनाने का दावा करने वाले थे, लेकिन राज्यपाल ने उन्हें मौका देने से इंकार करते हुए बिहार विधानसभा को 23 मई 2005 को मध्यरात्रि भंग कर दिया। जिसके बाद ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 

अक्तूबर 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार विधानसभा को भंग करने के फैसले को असंवैधानिक ठहरा दिया। सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि राज्यपाल बूटा सिंह ने असंवैधानिक निर्णय लेते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल को गुमराह किया।

2005 झारखंड मामला

झारखंड की सत्ता की जंग 2005 में सुप्रीम कोर्ट पहुंची। अर्जुन मुंडा ने झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) प्रमुख शिबू सोरेन को राज्य का मुख्यमंत्री बनाने के राज्यपाल के फैसले को चुनौती दी। पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने राज्यपाल के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी। 

सुप्रीम कोर्ट ने 9 मार्च 2005 को झारखंड विधानसभा को बहुमत साबित करने का आदेश दिया। 11 मार्च 2005 को सुप्रीम कोर्ट ने फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश जारी किया। फ्लोर टेस्ट में अर्जुन मुंडा ने विश्वास मत हासिल कर लिया।
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1998 में यूपी का घमासान पहुंचा सुप्रीम कोर्ट 

21 फरवरी 1998 में यूपी के तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर जगदंबिका पाल को रात में 10.30 बजे मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। उस वक्त जगदंबिका पाल कल्याण सिंह की ही सरकार में ट्रांसपोर्ट मंत्री थे। लेकिन कल्याण सिंह रात में ही हाईकोर्ट पहुंच गए।

हाईकोर्ट ने अगले दिन राज्यपाल के आदेश पर रोक लगा दी और कल्याण सरकार को फिर से बहाल कर दिया। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंचा। 24 फरवरी 1998 को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में 48 घंटे के भीतर बहुमत साबित करने का आदेश दिया। 26 फरवरी को एक बार फिर शक्ति प्रदर्शन हुआ इसमें कल्याण सिंह की जीत हुई।

1989 कर्नाटक मामला

1989 में कर्नाटक में जनता दल की सरकार थी जिसकी कमान एसआर बोम्मई के हाथ में थी। 1989 में वहां के तत्कालीन राज्यपाल पी वेंकटसुबैया ने बहुमत खोने का हवाला देते हुए सरकार को बर्खास्त कर दिया और राष्ट्रपति शासन लागू हो गया। 

एस आर बोम्मई को विधानसभा में बहुमत साबित करने से राज्यापल द्वारा इनकार करने के बाद मामला पहले कर्नाटक हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज कर दी जिसके बाद बोम्मई, राज्यपाल के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला पांच साल बाद 11 मार्च 1994 में आया। 9 जजों की संवैधानिक पीठ द्वारा सुनाए गए इस ऐतिहासिक फैसले की चर्चा आज भी होती है। कोर्ट ने राज्य सरकार की मनमाने तरीके से बर्खास्तगी को खत्म कर दिया और दोबारा सरकार बनाने को कहा। शीर्ष अदालतन ने कहा कि राष्ट्रपति को राज्य सरकार को बर्खास्त करने का पूर्ण अधिकार नहीं है। 
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