उत्तराखंड में हरीश रावत सरकार के पास बहुमत नहीं होने की बात कहते हुए राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। कांग्रेस के नौ विधायकों की बगावत के बाद मुश्किलों में घिरी हरीश रावत सरकार को 28 मार्च को बहुमत साबित करना था।
लेकिन इससे पहले राष्ट्रपति शासन लागू कर दिया गया। जिसके बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। मई 2016 में सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रपति शासन हटाते हुए हरीश रावत की सरकार फिर से बहाल कर दिया।
2005 में बिहार मामला पहुंचा सुप्रीम कोर्ट
जनता दल यूनाइडेट (जेडीयू) के नेता नीतीश कुमार सरकार बनाने का दावा करने वाले थे, लेकिन राज्यपाल ने उन्हें मौका देने से इंकार करते हुए बिहार विधानसभा को 23 मई 2005 को मध्यरात्रि भंग कर दिया। जिसके बाद ये मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
अक्तूबर 2005 में सुप्रीम कोर्ट ने बिहार विधानसभा को भंग करने के फैसले को असंवैधानिक ठहरा दिया। सुप्रीम कोर्ट के पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा कि राज्यपाल बूटा सिंह ने असंवैधानिक निर्णय लेते हुए केंद्रीय मंत्रिमंडल को गुमराह किया।
2005 झारखंड मामला
झारखंड की सत्ता की जंग 2005 में सुप्रीम कोर्ट पहुंची। अर्जुन मुंडा ने झारखंड मुक्ति मोर्चा (जेएमएम) प्रमुख शिबू सोरेन को राज्य का मुख्यमंत्री बनाने के राज्यपाल के फैसले को चुनौती दी। पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने राज्यपाल के फैसले के खिलाफ याचिका दायर की थी।
सुप्रीम कोर्ट ने 9 मार्च 2005 को झारखंड विधानसभा को बहुमत साबित करने का आदेश दिया। 11 मार्च 2005 को सुप्रीम कोर्ट ने फ्लोर टेस्ट कराने का आदेश जारी किया। फ्लोर टेस्ट में अर्जुन मुंडा ने विश्वास मत हासिल कर लिया।
21 फरवरी 1998 में यूपी के तत्कालीन राज्यपाल रोमेश भंडारी ने कल्याण सिंह की सरकार को बर्खास्त कर जगदंबिका पाल को रात में 10.30 बजे मुख्यमंत्री पद की शपथ दिला दी। उस वक्त जगदंबिका पाल कल्याण सिंह की ही सरकार में ट्रांसपोर्ट मंत्री थे। लेकिन कल्याण सिंह रात में ही हाईकोर्ट पहुंच गए।
हाईकोर्ट ने अगले दिन राज्यपाल के आदेश पर रोक लगा दी और कल्याण सरकार को फिर से बहाल कर दिया। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में भी पहुंचा। 24 फरवरी 1998 को सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश विधानसभा में 48 घंटे के भीतर बहुमत साबित करने का आदेश दिया। 26 फरवरी को एक बार फिर शक्ति प्रदर्शन हुआ इसमें कल्याण सिंह की जीत हुई।
1989 कर्नाटक मामला
1989 में कर्नाटक में जनता दल की सरकार थी जिसकी कमान एसआर बोम्मई के हाथ में थी। 1989 में वहां के तत्कालीन राज्यपाल पी वेंकटसुबैया ने बहुमत खोने का हवाला देते हुए सरकार को बर्खास्त कर दिया और राष्ट्रपति शासन लागू हो गया।
एस आर बोम्मई को विधानसभा में बहुमत साबित करने से राज्यापल द्वारा इनकार करने के बाद मामला पहले कर्नाटक हाईकोर्ट पहुंचा। हाईकोर्ट ने रिट याचिका खारिज कर दी जिसके बाद बोम्मई, राज्यपाल के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला पांच साल बाद 11 मार्च 1994 में आया। 9 जजों की संवैधानिक पीठ द्वारा सुनाए गए इस ऐतिहासिक फैसले की चर्चा आज भी होती है। कोर्ट ने राज्य सरकार की मनमाने तरीके से बर्खास्तगी को खत्म कर दिया और दोबारा सरकार बनाने को कहा। शीर्ष अदालतन ने कहा कि राष्ट्रपति को राज्य सरकार को बर्खास्त करने का पूर्ण अधिकार नहीं है।