जफर सरेशवाला बताते हैं कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने यह भरोसा दिया है कि अगर राज्य में भाजपा-शिवसेना गठबंधन की सरकार दोबारा बनती है तो राज्य सरकार प्राथमिकता के आधार पर यह मुद्दा हल करेगी।
मुख्यमंत्री फडणवीस ने मुस्लिम समाज के नेताओं से पूछा कि पिछले पांच सालों में उनकी सरकार के दौरान क्या मुसलमानों के साथ कोई ज्यादती या नाइंसाफी हुई। जबकि इसके पहले अक्सर मुस्लिम नौजवानों को मुंबई पुलिस और एटीएस जब चाहे बिना किसी आरोप या सबूत के बुलाकर प्रताड़ित करती थी।
सरेशवाला बताते हैं कि मुस्लिम नेताओं ने इससे सहमति जाहिर की। सरेशवाला ने यह भी कहा कि भले ही देश के अन्य हिस्सों से गौरक्षा के नाम पर मुसलमानों को निशाना बनाने की खबरें आती रहती हैं, लेकिन शुरुआत की कुछ घटनाओं के बाद महाराष्ट्र में इस तरह की हिंसा की खबरें आनी बंद हो गईं।
क्योंकि फडणवीस सरकार ने पुलिस को स्पष्ट निर्देश दे दिए थे कि एसी घटनाओं के लिए सीधी जिम्मेदारी स्थानीय पुलिस प्रशासन की होगी। साथ ही यह निर्देश भी दिए गए कि किसी को भी बिना ठोस सबूत के पुलिस बेवजह परेशान न करे।
असदुद्दीन ओवैसी (फाइल फोटो)
मुस्लिम राजनीति के इन दिनों बेहद आक्रामक चेहरे सांसद असउद्दीन ओवैसी की पार्टी एमआईएम भी चुनाव मैदान में है। मुंबई में उनके एक विधायक वारिस पठान पिछली बार महज डेढ़ हजार वोटों से जीते थे, इस बार कड़े मुकाबले में फंसे हैं। पिछली बार भाजपा शिवसेना अलग अलग लड़े थे जिसका फायदा पठान को मिला था।
लोकसभा चुनावों में जिस तरह ओवैसी की एमआईएम ने दलित नेता और डॉ. भीमराव अंबेडकर के पोते प्रकाश अंबेडकर के साथ गठबंधन करके कांग्रेस-एनसीपी का खेल कई सीटों पर खराब किया था और औरंगाबाद की लोकसभा सीट भी एमआईएम ने जीत ली थी। लेकिन इस बार अंबेडकर और ओवैसी अलग-अलग मैदान में हैं।
इसलिए भी एमआईएम को मुसलमान भी महज वोट काटने वाली पार्टी मान रहे हैं। ओवैसी की तकरीर सुनने लोग तो जुटते हैं, लेकिन वोट कितने मिलेंगे यह कह पाना मुश्किल है। मुस्लिम इलाकों में लोगों से बात कीजिए तो एमआईएम को लेकर वैसा आकर्षण अब नहीं मिलता है जो 2014 के लोकसभा और विधानसभा चुनावों में था और कुछ हद तक 2019 के लोकसभा चुनावों में भी कहीं-कहीं दिखता था।
हालाकि मुंबई कांग्रेस के पूर्व महासचिव आसिफ फारुकी इससे सहमत नहीं हैं कि मुसलमानों में भाजपा-शिवसेना के प्रति लगाव पैदा हो रहा है। फारुकी कहते हैं कि यह सही है कि कांग्रेस एनसीपी गठबंधन अगर और बेहतर तरीके से चुनाव मैदान में उतरता तो मुस्लिम खुलकर समर्थन में पहले की तरह आते। लेकिन इसके बावजूद मुसलमान सेक्युलर ताकतों के ही साथ हैं और रहेंगे।
वहीं प्रापर्टी डीलिंग का कारोबार करने वाले हामिद कहते हैं कि भाजपा शिवसेना को हराने और सेक्युलरिज्म का ठेका अकेले मुसलमानों का ही नहीं है। हमें भी इस मुल्क में रहना है और अमन के साथ अपना कारोबार करना है। इसलिए जो उम्मीदवार और पार्टी हमारी भलाई के लिए काम करेगी हम उसे वोट देंगे, चाहे कोई भी हो।
मुबीन भाई कहते हैं कि पहले कांग्रेस-एनसीपी वाले मुसलमानों को डराते थे कि अगर उन्हें वोट नहीं दिया तो भाजपा-शिवसेना आ जाएगी। लेकिन अब तो पिछले पांच साल से भी ज्यादा वक्त से देश में और राज्य में भाजपा की सरकार ही है तो कौन सी आफत आ गई। इसलिए अब मुसलमानों ने ज्यादा खुले दिमाग से सोचना शुरु कर दिया है।