भाजपा द्वारा 70 हजार करोड़ के सिंचाई घोटाले के आरोपी अजित पवार पर भरोसा करना एक भूल थी। लेकिन अचानक रातों-रात भाजपा ने उन पर इतना विश्वास कैसे कर लिया? अजित पवार के पास 54 विधायक होने के दावे की सत्यता परखने की जगह केंद्र और राज्य में सत्तासीन भाजपा सीधे राजभवन दौड़ पड़ी। आखिर में अजित पवार के सबसे विश्वस्त सुनील तटकरे और धनंजय मुंडे जैसे नेता भी उनका साथ छोड़ गए।
सरकार के स्थायित्व का सवाल
शिवसेना ने एनसीपी और कांग्रेस के साथ मिलकर सरकार भले ही बना ली हो लेकिन उसके स्थायित्व पर फिलहाल प्रश्न चिन्ह लगा है। जिन दलों को अपना न्यूनतम साझा कार्यक्रम तय करने में ही 15 दिन लग गए हों, वे सरकार कैसे चलाएंगे यह समझना कठिन नहीं है। हालांकि महाराष्ट्र में काफी लंबे समय से गठबंधन सरकारें ही चल रही हैं।
दूसरे राज्यों पर भी राजनीतिक असर
महाराष्ट्र के घटनाक्रम का राजनीतिक असर दूसरे राज्यों पर भी पड़ सकता है, खासतौर पर झारखंड और दिल्ली जैसे राज्यों पर जहां अगले कुछ महीनों में ही चुनाव होने हैं। कर्नाटक में पांच दिसंबर को होने वाले 14 विधानसभा सीटों के उपचुनाव पर भी इसका असर पड़ सकता है। उसके बाद बिहार में चुनाव होने हैं।
एनडीए का सिमटता कुनबा
48 दलों से बने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में भाजपा के अलावा अब सिर्फ दो ही बड़े दल बचे हैं - जनता दल यू और शिरोमणि अकाली दल। शिवसेना के जाने के बाद अब एनडीए का कुनबा सिमटने लगा है। इसकी वजह भाजपा द्वारा खुद को अन्य राज्यों में फैलाने के प्रयास है। इसी से सहयोगी दल डर रहे हैं।
सबसे अधिक फायदे में कांग्रेस
इस घटनाक्रम का सबसे अधिक लाभ चुनाव में चौथे नंबर पर आने वाली कांग्रेस को हुआ है। वह भी तब जब उसके अधिकतर प्रमुख नेता चुनाव से पहले पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए थे। सोनिया गांधी या प्रियंका गांधी ने राज्य में प्रचार नहीं किया था। और राहुल गांधी की भी चंद सभाएं ही आयोजित की गईं थी।