सार
मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को ट्रांसजेंडर और मध्यलिंगी व्यक्तियों के लिए आरक्षण पर जल्दी फैसला करने को कहा है। ताकि उन्हें हर बार कोर्ट का सहारा न लेना पड़े। न्यायालय ने हाल ही में जारी ट्रांसजेंडर नीति की सराहना की, लेकिन हॉरिजॉन्टल आरक्षण पर स्पष्टता मांगी है।
ट्रांसजेंडर और मध्यलिंगी व्यक्तियों के आरक्षण के मामले में मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार को अहम निर्देश दिए है। इसके तहत कोर्ट ने राज्य सरकार से कहा है कि वह ट्रांसजेंडर और मध्यलिंगी व्यक्तियों के लिए आरक्षण का निर्णय जल्द लें। ताकि उन्हें हर बार नौकरी या शिक्षा में आरक्षण के लिए कोर्ट का सहारा न लेना पड़े। यह आदेश न्यायमूर्ति एन आनंद वेंकटेश ने सोमवार को एक याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। याचिका एन सुषमा और यू सेमा अग्रवाल ने दाखिल की थी। इस मामले की अगली सुनवाई 15 सितंबर को होगी।
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बता दें कि इस मामले में न्यायाधीश ने सरकार द्वारा हाल ही में जारी की गई तमिलनाडु स्टेट पॉलिसी फॉर ट्रांसजेंडर पर्सन्स 2025 की तारीफ भी की, जो 31 जुलाई 2025 से लागू हो चुकी है। इसको लेकर अदालत ने कहा कि नीति में रोजगार और शिक्षा संस्थानों में प्रतिनिधित्व का अधिकार का जिक्र है, लेकिन यह साफ नहीं है कि सरकार ट्रांसजेंडर और मध्यलिंगी लोगों को हॉरिजॉन्टल आरक्षण देना चाहती है या नहीं। यह समुदाय की मुख्य मांग भी है। इसलिए सरकार को निर्देश दिया गया कि वह इस विषय पर जल्द फैसला करे।
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एलजीबीक्यूए+ को लेकर नीति बनाने पर जोर
साथ ही, अतिरिक्त लोक अभियोजक ने बताया कि एलजीबीक्यूए+ समुदाय के लिए भी नीति बनाने का काम चल रहा है, जिसे जल्द पूरा किया जाना चाहिए। न्यायाधीश ने कहा कि अब जबकि ट्रांसजेंडर और मध्यलिंगी व्यक्तियों के लिए नीति बन चुकी है, सरकार को एलजीबीक्यूए+ समुदाय के लिए भी जल्द नीति बनानी चाहिए। गौरतलब है कि मामले में कोर्ट के इस आदेश से उम्मीद है कि तमिलनाडु में ट्रांसजेंडर और संबंधित समुदायों को रोजगार और शिक्षा में आरक्षण मिल सकेगा और उनके अधिकारों को मजबूत किया जाएगा।