महात्मा गांधी आजादी का पहला दिन यानी 15 अगस्त, 1947 का दिन पाकिस्तान में बिताना चाहते थे। पूर्व केंद्रीय मंत्री व भाजपा नेता एमजे अकबर की नई किताब में यह दावा किया गया है।
इस गतिरोध की कीमत आम लोगों को चुकानी पड़ी, जिन्हें पीढ़ियों तक नहीं भुलाया जा सकता। लेखक के मुताबिक आजादी के बाद गांधी जी की पहली चिंता बंटवारे का दंश झेलने वाले पीड़ितों को लेकर थी यानी अल्पसंख्यक। पाकिस्तान में हिंदू और भारत में मुस्लिम।
किताब में लिखा गया है, 'वह पूर्वी पाकिस्तान के नोआखली में रहना चाहते थे। यहां 1946 में हुए दंगों में हिंदुओं को काफी प्रताड़ना झेलनी पड़ी थी। गांधी सांप्रदायिक हिंसा के बाद शांति की उम्मीद को लेकर शंकित थे।'
किताब में लिखा गया है कि 31 मई, 1947 को गांधी ने पठान नेता अब्दुल गफ्फार खान से कहा था कि वह उत्तर पश्चिम फ्रंटियर जाना चाहते हैं और आजादी के बाद यहीं रहना चाहते हैं। अब्दुल गफ्फार खान को 'फ्रंटियर गांधी' के नाम से भी जाना जाता था।
किताब में गांधी जी के हवाले से कहा गया है, 'मैं देश के बंटवारे के पक्ष में नहीं हूं। मैं किसी की अनुमति लेने नहीं जा रहा हूं। अगर कोई इस अवहेलना के लिए मुझे मारना चाहता है, तो मार सकता है। मैं हंसते हुए मौत को स्वीकार कर लूंगा। अगर पाकिस्तान बनता है तो मैं वहीं जाना चाहूंगा, घूमना चाहूंगा, वहां रहना चाहूंगा और यह देखना चाहूंगा कि वे मेरे साथ क्या करते हैं।'
अकबर ने कहा उस उतार-चढ़ाव भरे माहौल में गांधी जी का यही पक्ष रहा। उन्होंने लिखा, '50 साल से ज्यादा समय तक वह एक ही बात पर अड़े रहे। उनके भजन में सर्वधर्म, सभी जातियों के लिए सद्भाव, सहिष्णुता और एकता को जगह मिली। चाहे दक्षिण अफ्रीका हो या फिर भारत, अपनी आखिरी सांस तक वह बार-बार यह बताते रहे कि उन्हें हिंदू होने पर गर्व है।'
वहीं दूसरी तरफ जिन्ना ने अपने व्यक्तित्व को राजनीतिक लक्ष्य हासिल करने के लिहाज से ढाला। छह दशक तक उन्होंने शायद मुस्लिम धर्म का पालन किया हो। 1937 के बाद वह अचानक से अलग इस्लामिक देश की मांग के अगुवा बन गए।