भारतीय नौसेना की ताकत में और इजाफा होने वाली है। गार्डनरीच शिपबिल्डर्स एंड इंजीनियर्स लिमिटेड (जीआरएसइ) द्वारा निर्मित पहले एंटी-सबमरीन वारफेयर शैलो वाटर क्राफ्ट (एएसडब्ल्यूएसडब्ल्यूसी) का मंगलवार को रक्षा मंत्रालय की वित्तीय सलाहकार (रक्षा सेवाएं) रसिका चौबे ने लॉन्च किया।
इस अवसर पर जीआरएसई के अध्यक्ष और प्रबंध निदेशक (सीएमडी) कमोडोर पीआर हरि, भारतीय नौसेना (सेवानिवृत्त), प्रमुख (एलएंडटी शिपबिल्डिंग) कमोडोर अशोक खेतान, आरएडीएम संदीप मेहता, एसीडब्ल्यूपीएंडए, भारतीय नौसेना, आरके दास, निदेशक (वित्त), जीआरएसई एवं भारतीय सशस्त्र बलों, जीआरएसई और एलएंडटी के अन्य वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।
उल्लेखनीय है कि जीआरएसई भारतीय नौसेना के लिए आठ एएसडब्ल्यूएसडब्ल्यूसी का निर्माण कर रहा है। ये 'साइलेंट हंटर्स' भारतीय नौसेना को सौंपे जाने के बाद तटीय सीमाओं पर दुश्मनों की पनडुब्बियों का पता लगाने में और आसानी होगी। 77.6 मीटर लंबे और 10.5 मीटर चौड़े वाला यह जहाज तीन डीजल चालित जेट वाटर द्वारा संचालित हैं। यह निगरानी के साथ दुश्मनों को खोजने और हमले में सक्षम है।
जीआरएसई ने आठ महीनों (22 मई से अब तक) में छह जहाजों को लांच करके एक बार फिर रिकार्ड बनाया है, जिनमें दूसरा प्रतिष्ठित पी17ए, दो इन-हाउस डिजाइन किए गए सर्वेक्षण पोत (बड़े), एक तेज गश्ती जहाज, गुयाना के लिए समुद्र में जाने वाला एक यात्री सह कार्गो और अब पहला एएसडब्ल्यूएसडब्ल्यूसी शामिल हैं। नौसेना की परंपरा के अनुसार इस जहाज का नाम उसके पूर्ववर्ती के नाम पर 'अर्णाला' रखा गया है, जिसे 1999 में सेवामुक्त कर दिया गया था।
रसिका चौबे ने जहाज निर्माण में 90 प्रतिशत स्वदेशीकरण की दिशा में जीआरएसई के प्रयास और भारत सरकार के 'आत्मनिर्भर भारत' मिशन में उसके योगदान की सराहना की। उन्होंने भारतीय नौसेना की एंटी-सबमरीन वारफेयर क्षमता बढ़ाने में जीआरएसई के योगदान का उल्लेख करते हुए सशस्त्र बलों को सर्वोत्तम और नवीनतम तकनीक से लैस करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा, आज पनडुब्बी रोधी युद्धपोत का शुभारंभ इस दिशा में एक और कदम है। कमोडोर पीआर हरि ने अपने कहा, अर्णाला 'मेक इन इंडिया' पहल का अभिनव उदाहरण है। यह भारत की स्वदेशी डिजाइन क्षमता का प्रमाण है।