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Health: इस बीमारी से सावधान, साइलेंट किलर है ये, स्पष्ट लक्षण नजर नहीं आते, हर साल 44 लाख लोगों की मौत

Tue, 18 Feb 2025 05:16 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र डिजिटल ब्यूरो, अमर उजाला

सार

कोलेस्ट्रॉल एक वसायुक्त पदार्थ है, जो हमारे शरीर में स्वाभाविक रूप से पाया जाता है। यह कोशिका झिल्ली, कुछ हार्मोन और मजबूत हड्डियों एवं इम्युनिटी के लिए 'विटामिन डी' के निर्माण के लिए आवश्यक है। अपनी महत्वपूर्ण भूमिका के बावजूद कोलेस्ट्रॉल का उच्च स्तर हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। खासकर हमारे दिल के लिए।
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स्वास्थ्य पर बैड कोलेक्स्ट्रॉल का असर। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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जब खून में लो-डेंसिटी लिपोप्रोटीन कोलेस्ट्रॉल (एलडीएलसी) बढ़ता है, तो दिल की बीमारियों का जोखिम काफी हद तक बढ़ जाता है। इसे 'बैड कोलेस्ट्रॉल' भी कहा जाता है। यह एक ऐसी बीमारी है, जिसका दूसरा नाम 'साइलेंट किलर' है। यानी इस बीमारी का कोई स्पष्ट लक्षण नजर नहीं आता। इसके चलते हर साल 44 लाख लोगों की मौत हो जाती है। यूं भी कह सकते हैं कि सारी मौतों में से 7.8% मौतें हाई कोलेस्ट्रॉल के कारण होती हैं। भारत में 31% लोगों को हाई कोलेस्ट्रॉल है। पहले यह माना जाता था कि हाई कोलेस्ट्रॉल की स्थिति 50 की उम्र में ही आती है। अब ऐसा नहीं है, 18 साल की उम्र में भी इस टेस्ट को करा लेना चाहिए। 
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कोलेस्ट्रॉल एक वसायुक्त पदार्थ है, जो हमारे शरीर में स्वाभाविक रूप से पाया जाता है। यह कोशिका झिल्ली, कुछ हार्मोन और मजबूत हड्डियों एवं इम्युनिटी के लिए 'विटामिन डी' के निर्माण के लिए आवश्यक है। अपनी महत्वपूर्ण भूमिका के बावजूद कोलेस्ट्रॉल का उच्च स्तर हमारे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो सकता है। खासकर हमारे दिल के लिए। विशेषकर जब खून में लो-डेंसिटी लिपोप्रोटीन कोलेस्ट्रॉल (एलडीएलसी) बढ़ जाता है, तब दिल की बीमारियों का जोखिम, यह खतरा बढ़ता चला जाता है। हाई एलडीएलसी का ज्यादा चिंताजनक पहलू यह है कि इसके कोई लक्षण नहीं होते हैं। यही वजह है कि इसे 'साइलेंट किलर' भी कहा जाता है। 

हम अक्सर इस पर तब तक ध्यान नहीं देते हैं, जब तक गंभीर स्थिति न बने। एलडीएलसी का हाई लेवल एक बीमारी पैदा कर सकता है, जिसे एथेरोस्क्लेरोसिस कहा जाता है। इसमें एलडीएलसी के कण रक्त वाहिकाओं की दीवारों पर जम जाते हैं और प्लाक बनाकर उन्हें संकरा कर देते हैं। ऐसे में रक्त के प्रवाह का मार्ग बाधित हो जाता है और हार्ट अटैक, स्ट्रोक तथा आर्टेरी की बीमारियाँ होती हैं।
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पहले माना जाता था कि हाई कोलेस्ट्रॉल की स्थिति 50 की उम्र के बाद ही आती है, लेकिन यह सच नहीं है। 18 साल का होते ही व्यक्ति को लिपिड प्रोफाइल की जाँच नियमित रूप से करवानी चाहिये, क्योंकि समस्या का जल्दी पता लगने से सही समय पर दखल दिया जा सकेगा। हर व्यक्ति के लिये एलडीएलसी के टारगेट लेवल अलग होते हैं और उन पर आयु, अन्य बीमारियों और आनुवांशिकी जैसे विभिन्न कारकों का प्रभाव रहता है।

सर गंगाराम हॉस्पिटल, दिल्ली में सीनियर कंसल्टेन्ट कार्डियोलॉजिस्ट डॉ. अश्विनी मेहता कहते हैं, यह बिलकुल सही है कि हाई कोलेस्ट्रॉल वाले कई लोगों को लगता है कि वे बिल्कुल सही हैं। वे इसके संभावित जोखिमों को कम आंकते हैं। यही कारण है कि कई मरीज इलाज और उपायों को जारी नहीं रखते हैं, क्योंकि हाई कोलेस्ट्रॉल में सामान्य दर्द या असहजता नहीं होती है। यह एक ऐसी आग है, जो धीरे-धीरे शरीर को खोखला कर देती है। 

कोलेस्ट्रॉल का आदर्श लेवल रखने, खासकर एलडीएलसी को कम करने के लिए लगातार और स्थायी प्रयास चाहिए। इसमें सेहतमंद आदतों के लिए लंबे समय तक प्रतिबद्ध रहना पड़ता है और बताई गई दवाएं लेनी पड़ती हैं। यहीं पर कई मरीज गलती कर बैठते हैं। इलाज की शुरुआत वह उत्साह से करते हैं, लेकिन एक बार टारगेट पर आते ही उत्साह अक्सर फीका हो जाता है या बीच में ही उनका मनोबल टूट जाता है। वे लगातार दवाएं नहीं ले पाते हैं और जीवनशैली में किए बदलावों की जगह फिर से पुरानी आदतों को अपना लेते हैं। 

दवाएं लेते रहना भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि लगातार दवाएं लेने से ही उनका असर दिखेगा। विभिन्न गलत धारणाओं के कारण भारत में दवा लेने की दर कम है। यह दर करीब 60 प्रतिशत है। हाई कोलेस्ट्रॉल लेवल्स को संभालने के लिये लिपिड कम करने वाली दवाएं दी जाती हैं, खासकर जब केवल जीवनशैली में बदलाव से काम न चले। गंभीर जोखिमों या अन्य बीमारियों से पीड़ित मरीजों को दवाएं लेना बहुत जरूरी होता है। यह दवाएं लिवर में कोलेस्ट्रॉल का बनना रोककर या खून से कोलेस्ट्रॉल का हटना बढ़ाकर काम करती हैं।
 
हालांकि, समय से पहले दवाएं लेना बंद करने या अनियमित रूप से दवाएं लेने से कोलेस्ट्रॉल को कम करने की उनकी क्षमता खत्म हो जाती है। कार्डियोवैस्कुलर स्वास्थ्य के लिये यह दवाएं कोई अस्थायी समाधान नहीं, बल्कि लंबे समय की घटक होती हैं। कोलेस्ट्रॉल को नियंत्रित करने का लक्ष्य सिर्फ़ एक संख्या प्राप्त करना नहीं है, बल्कि हृदय रोग और अन्य जटिलताओं के खतरे को भी कम करना है। जिस तरह हाई कोलेस्ट्रॉल धीरे-धीरे बढ़ता है, उसी तरह इसे नियंत्रित करने का रास्ता भी लंबा है और इसमें समय और प्रयास लगता है। 
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