आपसी रजामंदी से शादी करने वाले उत्तर प्रदेश के एक प्रेमी युगल को सुप्रीम कोर्ट ने बृहस्पतिवार मिला दिया। इस मामले में शीर्ष अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस आदेश को खारिज कर दिया, जिसमें युवती को नारी निकेतन भेजने का आदेश दिया गया था।
चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने एम्स की मेडिकल रिपोर्ट में पाया कि युवती बालिग है। इसके बाद पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश को खारिज करते हुए युवती को नारी निकेतन की जगह अपने पति के साथ रहने की इजाजत दे दी। साथ ही पीठ ने युवती के पिता की ओर से दर्ज एफआईआर को भी निरस्त कर दिया।
दरअसल, इलाहाबाद के इस प्रेमी युगल ने घर से भागकर शादी की थी। इसके बाद युवती के पिता ने गत वर्ष सितंबर में बेटी को नाबालिग बताते हुए एफआईआर दर्ज कराई थी। इसके लिए उन्होंने हाई स्कूल का सर्टिफिकेट पेश किया था। एफआईआर को खारिज करने के लिए प्रेमी युगल ने हाईकोर्ट का रुख किया था।
हाईकोर्ट ने युवती की मेडिकल जांच कर उसकी वास्तविक उम्र का पता लगाने के लिए कहा था। मेडिकल रिपोर्ट में पाया गया था कि युवती बालिग है। इसके बाद पुलिस ने एफआईआर पर रोक लगा दी और युवती को नारी निकेतन भेज दिया। हाईकोर्ट के इस आदेश को युवती ने यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी थी कि उसकी मर्जी जाने बगैर उसे नारी निकेतन भेज दिया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि चूंकि युवती बालिग है इसलिए उसे नारी निकेतन भेजने का फैसला गलत है। शीर्ष अदालत ने कहा कि युवती अपने पति के साथ रहने के लिए स्वतंत्र है।