देश में नए लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव को लेकर घमासान हुआ है, लेकिन ये पहला मौका नहीं है जब सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं। 1952 में जब पहली लोकसभा का गठन हुआ तो उस वक्त भी अध्यक्ष का निर्वाचन निर्विरोध नहीं हुआ था। 1967 और 1976 में भी ऐसा ऐसा मौका आया था। इसी तरह 1998 में भी विपक्ष ने अपना उम्मीदवार उतारा था।
15 मई 1952 में पहली लोकसभा के सांसदों ने मिलकर देश के पहले लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव किया। इसमें कांग्रेस की तरफ से जी. वी. मावलंकर, जो साल 1946 से अध्यक्ष की कुर्सी पर पदासीन थे और उनके खिलाफ सदन में नए चुनकर आए शंकर शांताराम मोरे उम्मीदवार बने थे। हालांकि ये चुनाव तो कांग्रेस के लिए मात्र एक औपचारिकता थी क्योंकि लोकसभा में कांग्रेस के पास आसान बहुमत था। पहले लोकसभा अध्यक्ष पद के दोनों उम्मीदवारों के बारे में जानिए...
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कौन थे जी. वी. मावलंकर?
गणेश वासुदेव मावलंकर, जिन्हें प्यार से दादा साहब मावलंकर के नाम से याद किया जाता है और पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उनको "लोक सभा के जनक" की उपाधि से सम्मानित किया था। नए राष्ट्र के पहले लोकसभा अध्यक्ष जी. वी. मावलंकर का जन्म 27 नवम्बर, 1888 को वर्तमान गुजरात राज्य के बड़ौदा में हुआ था। मावलंकर भारत के स्वतंत्र होने के बाद से 1952 में पहली लोकसभा के गठन तक उसके अध्यक्ष बने रहे। इसलिए जब तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने उनका नाम स्वतंत्र भारत की प्रथम लोक सभा के अध्यक्ष पद के लिए प्रस्तावित किया तो किसी को आश्चर्य नहीं हुआ। सदन ने प्रस्ताव को 55 के मुकाबले 394 मतों से स्वीकार किया।
कौन थे शंकर शांताराम मोरे?
वहीं अगर विपक्षी लोकसभा उम्मीदवार शंकर शांताराम मोरे की बात करें, तो उनका जन्म साल एक अगस्त, 1899 को महाराष्ट्र के पूना में हुआ था। वे साल 1952 के पहले लोकसभा चुनाव में सोलापुर से पीडब्ल्यू पार्टी के टिकट पर चुनाव जीतकर आए थे। शंकर शांताराम मोरे ने तीसरी लोकसभा चुनाव के दौरान कांग्रेस पार्टी के टिकट पर पूना लोकसभा सीट से जीत हासिल की थी।
इस तरीके से शुरू हुआ लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव
राष्ट्रपति राजेंद्र प्रसाद ने संविधान के अनुच्छेद 95 के खंड (1) की तरफ से प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए लोकसभा के सदस्य बी. दास को नए लोकसभा अध्यक्ष पद के चुनाव तक अध्यक्ष पद के कार्यों का निर्वहन करने के लिए नामित किया। इसके बाद प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जी.वी. मावलंकर को लोकसभा अध्यक्ष चुने जाने का प्रस्ताव रखा, जिसके बाद तमाम सदस्यों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया। फिर लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव को लेकर मतदान किया गया। जिसमें हां के पक्ष में 394 और ना के पक्ष में 55 लोगों ने मतदान किया।
मतदान के दौरान घटी रोचक घटना
लोकसभा अध्यक्ष के चुनाव को लेकर हुए मतदान में विपक्ष के उम्मीदवार शंकर शांताराम मोरे ने खुद अपने विरोधी उम्मीदवार जी.वी. मावलंकर के पक्ष में मतदान किया। इसके बाद शंकर शांताराम मोरे ने कहा, संसद की सर्वश्रेष्ठ परंपराओं में, एक शालीन प्रथा प्रचलित है जिसके अनुसार जब अध्यक्ष पद के लिए दो उम्मीदवार प्रस्तावित किए जाते हैं, तो प्रत्येक उम्मीदवार दूसरे उम्मीदवार के लिए वोट करता है। मैंने आपके लिए वोट देकर उस परंपरा का पालन किया है। उन्होंने आगे कहा कि मावलंकर हमारे नए गणराज्य के पहले अध्यक्ष के रूप में उन पर डाली गई ऐतिहासिक जिम्मेदारी से अवगत थे। वहीं अगर मतदान में ना के पक्ष में वोट करने वाले मुख्य लोगों में सुचेता कृपलानी का भी नाम शामिल हैं।
जी. वी. मावलंकर बने लोकसभा के पहले अध्यक्ष
इसके बाद सदन में मतदान के बाद अध्यक्ष पद की कुर्सी पर बैठे बी. दास ने घोषणा की, कि मैं ये एलान करता हूं कि श्री जी. वी. मावलंकर इस सदन के अध्यक्ष चुने गए हैं। इसके बाद प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू और तमाम वरिष्ठ सदस्यों ने जी. वी. मावलंकर को अध्यक्ष पद की कुर्सी पर पदासीन कराया। इसके बाद प्रधानमंत्री ने अध्यक्ष को संबोधित करते हुए उन्हें धन्यवाद दिया। वहीं नए अध्यक्ष को बधाई देते हुए सोलापुर से सांसद और विरोधी उम्मीदवार शंकर शांताराम मोरे ने कहा कि महोदय, मैं आपको बधाई देता हूं। मैं पराजित उम्मीदवार हूं और फिर भी आपके चुनाव से मुझसे ज्यादा खुश कोई नहीं है।
आपातकाल के दौरान हुआ लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव
- फोटो : अमर उजाला
1952 के बाद कब-कब लोकसभा अध्यक्ष पद पर मतदान की नौबत आई?
1952 के बाद 1967 और 1976 में लोकसभा अध्यक्ष पद के चुनाव में मतविभाजन की नौबत आई थी। वहीं, 1998 में सत्ता पक्ष की ओर से जीएमसी बालयोगी तो विपक्ष की ओर से पीए संगमा उम्मीदवार बने थे। हालांकि, मत विभाजन नहीं हुआ था। 1967 में विपक्ष ने तेन्नेटी विश्वनाथन को लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए उम्मीदवार बनाया था। अटल बिहारी वाजपेयी समेत विपक्ष के कई नेताओं ने विश्वनाथन को अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव पेश किया था। वहीं सत्ता पक्ष की ओर से नीलम संजीव रेड्डी को उम्मीदवार बनाया गया था। नीलम संजीव रेड्डी को लोकसभा अध्यक्ष बनाए जाने के प्रस्ताव पर मत विभाजन हुआ। इस प्रस्ताव के पक्ष में 278 वोट पड़े। वहीं, प्रस्ताव के विरोध में 207 मत पड़े। इस तरह रेड्डी लोकसभा अध्यक्ष चुने गए। यह दूसरा मौका था जब लोकसभा अध्यक्ष के पद के लिए मत विभाजन हुआ था।
आपातकाल के दौरान भी हुआ लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव
लोकसभा गठन के वक्त यह दूसरा मौका है जब लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव होगा। 1952 के अलावा एक और मौका ऐसा आया था जब लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव हुआ था। दरअसल, आपातकाल के दौरान 1976 में भी लोकसभा अध्यक्ष चुना गया था। जब एक दिसंबर 1975 को लोकसभा अध्यक्ष पद से लोकसभा अध्यक्ष जीएस ढिल्लों ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। इसके बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सदन में बलिराम भगत को नया लोकसभा अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव रखा, इंदिरा के प्रस्ताव का तत्कालीन संसदीय कार्य मंत्री के. रघु रमैय्या ने समर्थन किया। लेकिन भावनगर के सांसद पीएम मेहता ने जगन्नाथ राव जोशी को लोकसभा अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव पेश कर दिया। जिसका हाजीपुर के सांसद डीएन सिंह ने समर्थन किया। इसके बाद उपाध्यक्ष ने भगत को लोकसभा अध्यक्ष बनाने के प्रस्ताव पर मत विभाजन कराया। जिसमें भगत के पक्ष में 344 और विरोध में 58 मत पड़े। इस तरह से कांग्रेस उम्मीदवार बलिराम भगत जीत के बाद लोकसभा अध्यक्ष बने थे। जो 15 जनवरी 1976 से लेकर 25 मार्च 1977 तक लोकसभा अध्यक्ष के पद पर बने रहे।
1998 में ऐसे हुआ था लोकसभा अध्यक्ष का चुनाव
1998 में विपक्ष की ओर से शरद पवार ने पीए संगमा को लोकसभा अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव पेश किया था। हालांकि यह प्रस्ताव गिर गया। इसके बाद सत्तापक्ष की ओर से प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने जीएमसी बालयोगी को लोकसभा अध्यक्ष बनाने का प्रस्ताव पेश किया। यह प्रस्ताव ध्वनिमत से पारित हो गया। इस प्रस्ताव पर मतदान की नौबत नहीं आई।